आज से सौ वर्ष पहले श्रीअरविंद ने अपनी छोटी सी रचना भवानी मंदिर की भूमिका में लिखा था- हमने शक्ति को छोड़ दिया है और इसलिए शक्ति ने भी हमें छोड़ दिया है। श्रीअरविंद ने जब यह लिखा तब हम भारतवासी अंग्रेजों की अधीनता में रह रहे थे। पराधीनता में रहना हमारी दुर्बलता का ही परिणाम था। हमारे अनेक महापुरुष इस बिंदु पर लिखते-बोलते रहे थे कि सदियों की पराधीनता में हमारी शक्ति और क्षीण होती गई, जिससे मुक्त होना सर्वाधिक आवश्यक है। महाराष्ट्र में गणपति उत्सव, बंगाल में कालीपूजा और दुर्गापूजा का नवोन्मेष इसी भावना का प्रतिफलन था। स्वामी विवेकानंद ने हिंदुओं को बलवान, निर्भीक होने का उपाय करने के लिए हर तरह से प्रेरित किया था। उन्होंने तथा रवींद्रनाथ टैगोर, श्रीअरविंद जैसे अनेक मनीषियों ने इसे अंग्रेजों को भगाने से भी अधिक आवश्यक कार्य समझा था। उस कार्य की आज क्या स्थिति है? कहना होगा कि स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। अंग्रेजों के जाते ही हमारे राज्यकर्मी वर्ग को इतना निर्बल व संकल्पहीन समझा गया कि बाएं-दाएं विदेशी आक्रमण, अतिक्रमण होने लगे। यह स्थिति विगत डेढ़ सौ वर्ष के अंग्रेजी शासन में नहीं हुई थी। इसका कोई अर्थ है! शांति, अहिंसा और भाईचारे की बातों से राज-काज नहीं चलता।
स्वतंत्र भारत के भारतीय नेताओं को यह समझ आने से पहले लाखों निरीह नागरिकों और सैनिकों की बलि चढ़ गई! हमारी नई पीढि़यों से 1947 से 1962 के बीच का यह कटु इतिहास विशेषत: छिपाया गया है। इसी बनाव-छिपाव का दूसरा घातक परिणाम यह हुआ है कि राजनीतिक-बौद्धिक क्षेत्र में अज्ञानता के साथ कायरता और पाखंड का प्रसार भी होता गया। इससे विशेष कर बुद्धिजीवी वर्ग ग्रस्त है। विश्वविद्यालय और मीडिया क्षेत्र में यह विविध रूपों में प्रदर्शित होता रहता है। प्रचार तंत्र के सहारे इस बात को 'विचारधारा' के आवरण में छिपाकर सामान्य जन को भ्रमित रखा जा रहा है। कश्मीर, असम, बांग्लादेश, आतंकवाद से जुड़े सभी प्रसंगों पर हमारे बुद्धिजीवी और नेता जानते-बूझते झूठी बातें बढ़-चढ़ कर पेश करते हैं और असली बातें छिपाते हैं। इसमें भीरुता मुख्य कारण है। यशपाल की एक कहानी है 'फूलो का कुर्ता'। उसमें छोटी-सी अबोध गरीब बालिका है। उसके शरीर पर एकमात्र वस्त्र उसकी फ्रॉक है। किसी प्रसंग में लच्जा बचाने के लिए वह वही फ्रॉक उठाकर अपना मुंह ढक लेती है। कहना चाहिए कि हर कठिन मुद्दे पर हमारा बौद्धिक-राजनीतिक वर्ग अपनी लच्जा उसी बालिका के समान ढकता है। वह जब-तब मनमानी हत्या और हिंसा के संगठित अभियान चलाने वालों को दुखी, पीड़ित बताकर किसी और की आलोचना करने में कलम तोड़ने लगता है।
राजनीतिक शक्ति-संतुलन में यथास्थिति नहीं होती। यदि आप अनुचित दबाव रोकने के लिए सचेष्ट नहीं तो वह बढ़ता जाएगा। एकतरफा सद्भाव और एकतरफा सेक्यूलरिच्म उसी बालिका की तरह हिंदू भारत की लच्जा छिपा रही है। यह पूरी स्थिति देश के अंदर और बाहर वाले बिगड़ैल बखूबी जानते हैं, जबकि हमारे नेता, बुद्धिजीवी दिखाते हैं कि उन्होंने चतुराई दिखा कर दुनिया के सामने अपनी लच्जा बचा ली। उन्हें लगता है कि किसी ने नहीं देखा कि वे हिंसा तथा उग्रवादियों का दबाव स्वीकार कर रहे हैं- सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों रूपों में। यह लच्जा छिपती नहीं, बल्कि और उजागर होती है। हर प्रकार के संगठित उग्रवाद के समक्ष गोल-मोल बातें करना, झूठी भंगिमा बनाकर उत्पीड़क को ही उत्पीड़ित बताते हुए लफ्फाजी करना अत्यंत लच्जास्पद है, क्योंकि दुनिया भर में वास्तविक राजनीति, कूटनीति चलाने वाले हमारी दुर्बलता प्रत्यक्ष देख रहे हैं। यह कठोर सत्य है कि किसी समाज के नेतृत्व की दुर्बलता अंतत: सामाजिक दुर्बलता में बदल जाती है। हमारे राजनीतिक-बौद्धिक नेता संपूर्ण भारत को जाने-अनजाने उसी दिशा में धकेल रहे हैं। इसे पंजाब, बंगाल और कश्मीर के हश्र से देखा जा सकता है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर की एतिहासिक पुस्तक 'पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में सामाजिक शक्ति-संपन्नता और सामाजिक भीरुता, दोनों प्रवृत्तियों की संपूर्ण मन:स्थिति और परस्पर नीति अच्छी तरह प्रकाशित है। आज के भारत में पुन: वही दोहराया जा रहा है। मगर अब ऐसी पुस्तकों से भी बचने की कोशिश होती है। केवल गांधीजी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' लहराई जाती है, जिसमें लिखा है कि आत्मबल सबसे बड़ी चीज है। यह सब अज्ञान और कायरता छिपाने के बहाने बन जाते हैं। दब्बूपन को भलमनसाहत का रूप देने की खुली कवायद। जिससे अराजक तत्व और शह पाते हैं। यह प्रक्रिया सौ साल से कमोबेश यथावत है। हमारी अनेक समस्याओं की जड़ यही है। आज नहीं तो कल, हमें यह शिक्षा लेनी पड़ेगी कि भले लोगों को बलवान व चरित्रवान भी होना चाहिए। दुष्टता को सहना या आंखें चुराना दुष्टता को प्रोत्साहन है। रामायण और महाभारत ही नहीं, यूरोपीय चिंतन में भी यही शिक्षा है। हमारे मनीषियों ने तो विद्या की देवी को भी शस्त्र-सच्जित रखा था और हमने शक्ति की देवी को भी मिट्टी की मूरत में बदल कर रख दिया है। तामझाम से बिजली-बत्ती कर देना, लाखों रुपये की सजावट कर देना दुर्गा-पूजा या शक्ति-पूजा नहीं। पूजा है किसी संकल्प के लिए शक्ति-आराधन करना। सम्मान से जीने के लिए मृत्यु का वरण करने के लिए भी तत्पर होना। किसी तरह चमड़ी बचाकर नहीं, बल्कि दुष्टता का साहस से सामना करते हुए जीने की रीति बनाना। यही वह शक्ति-पूजा है जिसका आह्वान हमारे महापुरुषों ने किया था। उसकी प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गई है।
स्वतंत्र भारत के भारतीय नेताओं को यह समझ आने से पहले लाखों निरीह नागरिकों और सैनिकों की बलि चढ़ गई! हमारी नई पीढि़यों से 1947 से 1962 के बीच का यह कटु इतिहास विशेषत: छिपाया गया है। इसी बनाव-छिपाव का दूसरा घातक परिणाम यह हुआ है कि राजनीतिक-बौद्धिक क्षेत्र में अज्ञानता के साथ कायरता और पाखंड का प्रसार भी होता गया। इससे विशेष कर बुद्धिजीवी वर्ग ग्रस्त है। विश्वविद्यालय और मीडिया क्षेत्र में यह विविध रूपों में प्रदर्शित होता रहता है। प्रचार तंत्र के सहारे इस बात को 'विचारधारा' के आवरण में छिपाकर सामान्य जन को भ्रमित रखा जा रहा है। कश्मीर, असम, बांग्लादेश, आतंकवाद से जुड़े सभी प्रसंगों पर हमारे बुद्धिजीवी और नेता जानते-बूझते झूठी बातें बढ़-चढ़ कर पेश करते हैं और असली बातें छिपाते हैं। इसमें भीरुता मुख्य कारण है। यशपाल की एक कहानी है 'फूलो का कुर्ता'। उसमें छोटी-सी अबोध गरीब बालिका है। उसके शरीर पर एकमात्र वस्त्र उसकी फ्रॉक है। किसी प्रसंग में लच्जा बचाने के लिए वह वही फ्रॉक उठाकर अपना मुंह ढक लेती है। कहना चाहिए कि हर कठिन मुद्दे पर हमारा बौद्धिक-राजनीतिक वर्ग अपनी लच्जा उसी बालिका के समान ढकता है। वह जब-तब मनमानी हत्या और हिंसा के संगठित अभियान चलाने वालों को दुखी, पीड़ित बताकर किसी और की आलोचना करने में कलम तोड़ने लगता है।
राजनीतिक शक्ति-संतुलन में यथास्थिति नहीं होती। यदि आप अनुचित दबाव रोकने के लिए सचेष्ट नहीं तो वह बढ़ता जाएगा। एकतरफा सद्भाव और एकतरफा सेक्यूलरिच्म उसी बालिका की तरह हिंदू भारत की लच्जा छिपा रही है। यह पूरी स्थिति देश के अंदर और बाहर वाले बिगड़ैल बखूबी जानते हैं, जबकि हमारे नेता, बुद्धिजीवी दिखाते हैं कि उन्होंने चतुराई दिखा कर दुनिया के सामने अपनी लच्जा बचा ली। उन्हें लगता है कि किसी ने नहीं देखा कि वे हिंसा तथा उग्रवादियों का दबाव स्वीकार कर रहे हैं- सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों रूपों में। यह लच्जा छिपती नहीं, बल्कि और उजागर होती है। हर प्रकार के संगठित उग्रवाद के समक्ष गोल-मोल बातें करना, झूठी भंगिमा बनाकर उत्पीड़क को ही उत्पीड़ित बताते हुए लफ्फाजी करना अत्यंत लच्जास्पद है, क्योंकि दुनिया भर में वास्तविक राजनीति, कूटनीति चलाने वाले हमारी दुर्बलता प्रत्यक्ष देख रहे हैं। यह कठोर सत्य है कि किसी समाज के नेतृत्व की दुर्बलता अंतत: सामाजिक दुर्बलता में बदल जाती है। हमारे राजनीतिक-बौद्धिक नेता संपूर्ण भारत को जाने-अनजाने उसी दिशा में धकेल रहे हैं। इसे पंजाब, बंगाल और कश्मीर के हश्र से देखा जा सकता है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर की एतिहासिक पुस्तक 'पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में सामाजिक शक्ति-संपन्नता और सामाजिक भीरुता, दोनों प्रवृत्तियों की संपूर्ण मन:स्थिति और परस्पर नीति अच्छी तरह प्रकाशित है। आज के भारत में पुन: वही दोहराया जा रहा है। मगर अब ऐसी पुस्तकों से भी बचने की कोशिश होती है। केवल गांधीजी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' लहराई जाती है, जिसमें लिखा है कि आत्मबल सबसे बड़ी चीज है। यह सब अज्ञान और कायरता छिपाने के बहाने बन जाते हैं। दब्बूपन को भलमनसाहत का रूप देने की खुली कवायद। जिससे अराजक तत्व और शह पाते हैं। यह प्रक्रिया सौ साल से कमोबेश यथावत है। हमारी अनेक समस्याओं की जड़ यही है। आज नहीं तो कल, हमें यह शिक्षा लेनी पड़ेगी कि भले लोगों को बलवान व चरित्रवान भी होना चाहिए। दुष्टता को सहना या आंखें चुराना दुष्टता को प्रोत्साहन है। रामायण और महाभारत ही नहीं, यूरोपीय चिंतन में भी यही शिक्षा है। हमारे मनीषियों ने तो विद्या की देवी को भी शस्त्र-सच्जित रखा था और हमने शक्ति की देवी को भी मिट्टी की मूरत में बदल कर रख दिया है। तामझाम से बिजली-बत्ती कर देना, लाखों रुपये की सजावट कर देना दुर्गा-पूजा या शक्ति-पूजा नहीं। पूजा है किसी संकल्प के लिए शक्ति-आराधन करना। सम्मान से जीने के लिए मृत्यु का वरण करने के लिए भी तत्पर होना। किसी तरह चमड़ी बचाकर नहीं, बल्कि दुष्टता का साहस से सामना करते हुए जीने की रीति बनाना। यही वह शक्ति-पूजा है जिसका आह्वान हमारे महापुरुषों ने किया था। उसकी प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गई है।