यमुनानगर में पश्चिमी यमुना नहर की दुर्गति देखकर हरियाणा विधानसभा की पब्लिक एकाउंट्स कमेटी यानी पीएसी के सदस्यों की त्वरित टिप्पणी यह बताने के लिए काफी है कि नदियों की सफाई के नाम पर अब तक दिखावे के आंसू बहाए जा रहे थे। योजनाएं बनी, केंद्र से धन भी आया पर कहां गया, कोई बताने को तैयार नहीं, हां फाइलों का पेट जरूर भर दिया गया। यमुना में गंदगी बहे, जहरीले रसायनों की लहरें उठें या फिर योजनाओं के अवशेष जल बहाव का रास्ता रोकें, लगता है अभी किसी को कोई चिंता नहीं। कितना कड़वा सत्य है कि पश्चिमी यमुना नहर को अधिकारी डंपिंग स्टेशन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में सोनीपत से पानीपत तक यमुना की सफाई के लिए करोड़ों की योजना बनी थी। केंद्र तथा राज्य स्तर पर इस नदी की सफाई के लिए पिछले पांच वर्षो के दौरान कम से कम छह बार विमर्श हुआ, प्रदूषण पर दिल्ली सरकार से दो बार झड़प हुई, केंद्रीय जल बोर्ड ने निर्देश जारी किए पर इन सब का नतीजा क्या निकला? न प्रदूषण में मामूली कमी आई, न किसी योजना को अंतिम रूप दिया जा सका और न ही निकट भविष्य में किसी योजना पर प्रभावशाली क्रियान्वयन की संभावना नजर आ रही है। पीएसी के सदस्यों ने ट्विन सिटी यमुनानगर और जगाधरी में जो कुछ देखा और प्रतिक्रिया व्यक्त की उसके आलोक में राज्य सरकार को तत्काल जागते हुए एक्शन प्लान तैयार करके कम से कम अपने हिस्से की यमुना को साफ करने पर गंभीरता से जुट जाना चाहिए। रसायनयुक्त कचरा और सीवर का पानी सीधे नहर में गिराया जाना पानी को खतरनाक तो बना ही रहा है और साथ ही यमुना की पवित्रता पर भी कुठाराघात कर रहा है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा हो सकता है। विधानसभा की महत्वपूर्ण कमेटी अपनी रिपोर्ट प्रदेश सरकार को जल्द से जल्द सौंपे। इसके तथ्यों, निष्कर्षो के आधार पर वृहद योजना बनाई जाए और उस पर पूरी ईमानदारी से काम भी हो। सरकार इसमें रूचि भी ले क्योंकि उसकी अनदेखी के कारण ही यमुना खनन माफिया की पहली पसंद बन गई। भविष्य निश्चिंत रहे, इसके लिए जरूरी है वर्तमान में सतर्क और सक्रिय रहना। यमुना किनारे स्थित उद्योग इकाइयों पर विशेष निगरानी रखी जानी चाहिए। कड़े आर्थिक दंड और तालाबंदी जैसे प्रावधान यमुना को और मैली होने से बचा सकते हैं।