Wednesday, June 6, 2012

2009 की राजनीति --वाममोर्चा -यूपीए गठबंधन-एक निहितार्थ


वर्ष 2008 और वर्ष 2009 में केंद्रीय राजनीति के परिदृश्य में जो नहीं बदला वह यह है कि यूपीए गठबंधन ही सत्ता संभाल रहा है. लेकिन जो दृश्य बदल गया है वह यह है कि यूपीए की गठबंधन सरकार को अब वाममोर्चा का समर्थन नहीं है.

इस पर एक नज़रिया यह है कि यूपीए की नीतियों और निर्णयों पर नज़र रखने वाला वाममोर्चा इस बार नहीं है और दूसरा नज़रिया यह है कि यूपीए सरकार के हर काम में अडंगा लगाने वाले वामपंथियों को वर्ष 2009 के आम चुनाव ने हाशिए पर डाल दिया.

इसमें से जिस भी नज़रिए से सहमत हुआ जाए, इसका निहितार्थ एक ही है कि 2009 की राजनीति ने 32 साल से पश्चिम बंगाल में शासन कर रहे वाममोर्चा के क़िले में दरार डाल दी है.

चुनाव से पहले लोकसभा में वाममोर्चा के 57 सांसद हुआ करते थे और नई लोकसभा में उनकी संख्या घटकर 22 रह गई है. और ऐसा नहीं है कि उनकी ताक़त सिर्फ़ लोकसभा में कम हुई है, पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी जो कुछ हो रहा है, उसने भी संकेत दिए हैं कि वर्ष 2011 में होने वाले विधानसभा के चुनाव उनके लिए कठिन साबित होने वाले हैं.

2004 के लोकसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से 35 सीटें वाममोर्चा के पास थीं, लेकिन 2009 के चुनाव में वे सिर्फ़ 15 सीटें जीत सके.

इसके बाद राज्य में 16 नगर निकायों के चुनाव हुए जिसमें से 13 पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की. इससे पहले वाममोर्चा इनमें से 11 पर शासन कर रहा था. पंचायत चुनावों में भी वाममोर्चा को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए तो आठ सीटों पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की. वाममोर्चे का नेतृत्व करने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) को एक भी सीट नहीं मिली. वाममोर्चे की ओर से एकमात्र जीत मिली फ़ॉरवर्ड ब्लॉक को.

वैसे राज्य की राजनीति में साल प्रारंभ होते ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी जब नंदीग्राम में वाममोर्चा के एक अहम भागीदार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को तृणमूल कांग्रेस ने शिकस्त दी.

भूमि-सुधार की हिमायती रहे वाममोर्चा ने जब सिंगुर और नंदीग्राम में भूमि-सुधार के एकदम दूसरे सिरे पर जाकर उद्योगों के लिए ज़मीन देने का फ़ैसला किया तो उनके अपने काडर को यह नागवार गुज़रा. बहुत से लोगों को लगता था कि ममता बैनर्जी ने टाटा के नैनो परियोजना को राज्य से बाहर भेजकर राज्य का बहुत नुक़सान किया है लेकिन चुनाव परिणामों ने ज़ाहिर कर दिया कि इस बुद्धिजीवी सोच से मतदाताओं की सोच एकदम अलग है.

दूसरी ओर सिंगूर और नंदीग्राम में सुनियोजित हिंसा के जो आरोप लगे उसे धोना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.

वैसे पश्चिम बंगाल में एक नया परिवर्तन यह दिखा कि कलाकार और रचनाकार कभी संस्कृति पुरुष कहे जाने वाले बुद्धदेव के ख़िलाफ़ खड़े हो गए और फ़िल्म समारोह तक का बहिष्कार हुआ.

चुनाव परिणामों ने स्वाभाविक रुप से वाममोर्चा के घटक दलों के बीच भी मतभेद पैदा कर दिए हैं और अब सहयोगी दल ही सीपीएम काडर और उसके नेताओं की कार्यप्रणाली पर उंगलियाँ उठाने लगे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मानिनी चटर्जी कहती हैं, “पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो कुछ भी दिख रहा है कि वह ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी की जीत से अधिक वाममोर्चे की हार है.”

वे मानती हैं कि वर्ष 2009 के घटनाक्रम ने पार्टी के नेताओं के भीतर हताशा पैदा कर दी है. वे कहती हैं, “पश्चिम बंगाल में वामपंथी नेता जिस तरह से बर्ताव कर रहे हैं, उससे लगता है कि नेता पहले ही हार मान चुके हैं. उनका विश्वास बिखर गया है.”

हालांकि वे मानती हैं कि चुनाव की राजनीति में डेढ़ साल बहुत होते हैं और हो सकता है कि वाममोर्चा 2011 के विधानसभा के पहले अपना घर संभाल ले.

लेकिन ऐसा होने की संभावना कम ही दिखती है.

क्योंकि जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ़ पश्चिम बंगाल में ही नहीं हो रहा है. केरल, जहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन और सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन बारी-बारी से सत्ता में आता रहा है, स्थिति बहुत अलग नहीं दिख रही है.

वहाँ मुख्यमंत्री अच्युतानंदन और सीपीएम के राज्य इकाई के सचिव पिनरई विजयन के बीच जो विवाद हुआ उसने भी पार्टी की अंदरुनी स्थिति को बयान किया.

निश्चित तौर पर वामपंथी दलों के भीतर असमंजस की स्थिति है. और जैसा कि मानिनी चटर्जी कहती हैं कि यह दुविधा भाजपा की दुविधा से बड़ी है

मीटर गैज-ब्रोड गैज---रेलवे सिस्टम

भारत में आज भी रेलगाडियाँ कई अलग अलग माप के ट्रेक पर चलती है - जैसे कि ब्रोड गैज, मीटर गैज, नैरो गैज आदि.. परंतु सर्वमान्य ट्रेक अब ब्रोड गैज हो गया है. कई अन्य तकनीकों की तरह भारत का रेलवे सिस्टम भी अंग्रेजो के द्वारा ही विकसित किया गया था और उस जमाने के हिसाब से उसे मान्यता दी गई थी. तो फिर ब्रोड गैज और मीटर गैज के माप किस तरह से तय किए गए? आइए जानते हैं -

मीटर गैज -

1869 में लोर्ड मेयो ने जो कि भारत के वायसरॉय थे, एक फरमान जारी किया था कि भारत में भी रेलवे सिस्टम होना चाहिए और ट्रेन के डिब्बे में 4 व्यक्ति आराम से बैठ सकें इसलिए उसकी चौड़ाई 6 फूट 6 इंच होनी चाहिए. ट्रेन के ट्रेक का माप उसके 50% से कम नहीं होना चाहिए यानी कि 3 फूट 3 इंच. इसको मिलीमीटर में बदलने पर माप आता है 990 मिमी.

अंग्रेज उस समय भारत में मैट्रिक पद्धति ला रहे थे, इसलिए उन्होनें ट्रेक का माप सुविधा के लिए 1000 मिमी. यानी 1 मीटर कर दिया और इस तरह बना मीटर गैज ट्रेक का माप. भारत ने भी 1957 में माप की मैट्रिक प्रणाली को अपना लिया. भारत में आज 11,000 किमी से अधिक के ट्रेक मीटर गैज ही हैं.

ब्रोड गैज -

भारत में ब्रोड गैज ट्रेक का माप 5.5 फूट का होता है परंतु इंग्लैंड में जो स्टैंडर्ड गैज अपनाया गया था उसके ट्रेक का माप थोडा विचित्र यानी कि 4 फूट 8.5 इंच था. प्रश्न यह है कि इंग्लैंड ने इतने अटपटे माप को क्यों अपनाया? इसका जवाब इतिहास मे मिलता है. रोमन लोग अपने रथों के पहियों के बीच की दूरी को 4 फूट 8.5 इंच पर ही रखते थे, क्योंकि दो घोडों को आपस में टकराए बिना एक साथ दौडते रहने के लिए एक दूसरे से कम से कम इतना दूर होना जरूरी होता है.

रोमनों ने जब इंग्लैंड पर कब्जा किया तो उन्होनें वहाँ के मार्गों पर भी अपने रथ दौड़ाए. समय बीतने पर अंग्रेजों ने उसी माप की बग्गी बनाई और वर्षों तक उसका इस्तेमाल किया. इसके बाद पहले वाष्प इंजिन को जब बनाया गया तो उसका माप भी यही था. अंत में ज्योर्ज स्टीफंस ने पहला रेल इंजिन रॉकेट बनाया और उसकी चौड़ाई भी यही थी

Monday, June 4, 2012

गोमती नदी -सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट -एक गंदी झील और बीमारियों का कारण

 लखनऊ में एशिया का सबसे बड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चालू होने के बावजूद शहर में गोमती नदी का पानी साफ़ न होने से लोगों का ध्यान शहर की निचली धारा में बने बैराज की तरफ़ गया है.

इस बैराज के कारण गोमती लखनऊ में एक गंदी झील और बीमारियों का कारण बनकर रह गयी है. जानकार लोगों का कहना है कि नदी को साफ़ रखने के लिए उसका प्राकृतिक बहाव नही रोकना चाहिए.

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक़ ट्रीटमेंट प्लांट चालू होने के दो हफ्ते बाद 31 जनवरीको भैन्साकुंड बैराज के पास गोमती के पानी में घुलित ऑक्सीजन मात्र चार दशमलव पांच मिलीग्राम प्रति लीटर था .

एक साल पहले भी बैराज के पास घुलित ऑक्सीजन इतनी ही कम थी. देखने में भी पानी का रंग वैसा ही मटमैला है.

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक वरिष्ठ अधिकारी डाक्टर मधु भारद्वाज कहती हैं, "बैराज के पहले जो पानी रुक जाता है उसका सारा पानी की क्वालिटी पर पड़ता है, क्योंकि जब नदी बह रही होती है तो उसका स्वयं शुद्धिकरण का एक सिस्टम होता है और इसलिए बैराज के पास बहाव रुकने से नदी तालाब की तरह हो जाती है.बैराज के ऊपर कई नाले गिरते हैं,उसकी गंदगी भी रुकती है, जिसका असर पानी की क्वालिटी पर पड़ता है."

डॉक्टर मधु कहती हैं कि, "गर्मियों में हालत और ख़राब हो जाते हैं.कई बार बैराज के पास ऑक्सीजन लगभग शून्य हो जाती है. तब हम व्यक्तिगत रूप से प्रयास करते हैं कि बैराज के फाटक खुल जाएँ और गन्दगी निकल जाए."

प्रदूषण के कारण गोमती में मछलियों की संख्या बहुत कम हो गयी है. ऑक्सीजन कम होने से अक्सर बची खुची मछलियाँ भी दम घुटने से मर जाती हैं.

भैन्साकुंड शमसान घाट के पास बने इस बैराज का मकसद ऊपरी धारा में करीब 12 किलोमीटर दूर गऊ घाट पम्पिंग स्टेशन पर शहर की पेयजल सप्लाई के लिए पानी का स्तर बनाए रखना है.

प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट
प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार गोमती जब लखनऊ के गऊ घाट पर प्रवेश करती है, तब घुलित ऑक्सीजन की मात्रा दस से बारह मिलीग्राम प्रति लीटर होती है, यानि नदी का पानी साफ़ और पीने योग्य होता है.

लेकिन गऊ घाट से भैन्साकुंड के बीच इसी 12 किलोमीटर के भीतर शहर के डेढ़ दर्जन नाले सीवेज और कूडा कचरा लेकर नदी में मिलते हैं.

बैराज के फाटक अकसर बंद रहने से नदी का बहाव बंद रहता हैं.बैराज के पास 'सिल्ट' और गंदगी जमा होती है और सड़ते सीवर में घातक विषाणु,
जीवाणु पैदा होते हैं. कभी-कभी ये गंदगी वापस गऊ घाट तक पहुँचती है,जहां से शहर के पेयजल की सप्लाई होती है.

बैराज के पास में रहने वाले गोपाल कहते हैं कि बीस पचीस साल पहले यहाँ गोमती का पानी इतना साफ़ था कि नदी में सिक्का फेंक दो, तो उठा लें. अब नालों की गंदगी आने और बैराज का फाटक बंद होने से सिल्ट और गंदगी जमा रहती है.

बदबू,मच्छरों और कीड़े मकोड़ों से आसपास की आबादी का जीवन मुश्किल में है. यहीं पास में शमसान घाट है,जहां नदी एक गंदी झील के रूप में है और उसी गंदे पानी से लोग अंतिम संस्कार की औपचारिकताएं पूरी करते हैं. बैराज के उस पार नदी की धारा अक्सर बहुत पतली और सूखी रहती है.

लखनऊ के मेयर डाक्टर दिनेश शर्मा कहते हैं कि, "बैराज के कारण दस ग्यारह किलोमीटर नदी में पानी के ठहराव के कारण 'सिल्ट' और गंदगी जमा होने एक तो पानी प्रदूषित हो जाता है. दूसरे वह छेद भी बंद हो गए जो पानी के स्रोत हैं और जिनसे नदी नीचे से पानी रिचार्ज करती है.''

श्री शर्मा कहते हैं कि बैराज को गऊ घाट वाटर वर्क्स के पास ही शिफ्ट कर देना चाहिए ताकि नदी का बहाव बहाल हो और शहर को शुद्ध पेयजल भी मिलता रहे.

गोमती नदी पीलीभीत में माधो टांडा के पास एक झील से निकलकर बनारस के पास गंगा में मिलती है.लखनऊ से पहले जंगलों के कम होने और गन्ने की खेती के लिए पानी की अधिक खपत के चलते गोमती में पानी लगातार कम होता गया है.

'कुछ करना होगा'
राज्य जल अभिकरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ गोमती का जल प्रवाह पिछले तीस वर्षों में घटकर पैंतीस फीसदी रह गया है. वर्ष 1979 में लखनऊ में गोमती का औसत जल प्रवाह 4238 क्यूसेक था, जो वर्ष 2008 में घटकर मात्र 1448 रह गया है.

लेकिन जल निगम ने लगभग तीन सौ करोड रूपये लागत की जो प्रदूषण नियंत्रण योजना तैयार की थी,उसमे न तो गोमती जल ग्रहण क्षेत्र में जल संरक्षण की कोई योजना थी और न ही उसका बहाव बहाल करने की .

नगर विकास और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन मानते हैं, "नदी को बहना तो बहुत जरूरी है, नहीं तो प्रदूषण बढ़ जाता है. बहाव तो नदी में होना ही चाहिए."

आलोक रंजन कहते हैं कि इस मामले में कुछ करना होगा.

श्री रंजन कहते हैं कि शहर के सभी नाले जब 'डाइवर्ट' होकर भरवारा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में जाएंगे तब नदी का प्रदूषण खत्म हो जाएगा. अभी केवल कुकरैल और हैदर कैनाल को ही भरवारा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में डाइवर्ट किया गया है.

लेकिन जानकार कहते हैं कि गोमती नदी को पुनर्जीवन देने के लिए उसके समूचे जलग्रहण क्षेत्र पर ध्यान देना होगा और लखनऊ में बैराज का स्वरुप बदलकर ऎसी तकनीक अपनानी होगी जिससे गऊ घाट वाटर वर्क्स पर पेयजल के लिए पानी लेने के बाद जलधारा में रुकावट न आये और नदी अविरल बहती रहे

कुंभ की तैयारियां शुरू

 इलाहाबाद के संगम तट पर होने वाला महाकुंभ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक मेला होता है. प्रयाग में अगला महाकुंभ दिसंबर 2012 और जनवरी 2013 में होना है.

इतने बड़े मेले के आयोजन में ढेर सारी व्यवस्था करनी होती है. इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी से अगले कुंभ की तैयारियां शुरू कर दी हैं.

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ 12 साल पहले वर्ष 2001 में सदी के पहले महाकुंभ के दौरान एक महीने में कुल मिलाकर करीब आठ करोड़ लोगों ने गंगा स्नान किया था. दुनिया के कोने कोने से आए थे ये लोग.

लाखों लोगों के लिए गंगा और यमुना के संगम पर रेत और कछार में टेंट का अस्थायी नगर बसाकर कुंभ मेले की व्यवस्था करना अपने आप में एक बड़ा चुनौती भरा कार्य है. इसलिए कुंभ मेले की तैयारी तीन साल पहले शुरू हो जाती है.

इलाहाबाद के कमिश्नर पीवी जगन मोहन कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों की सुख सुविधा का बन्दोबस्त करना सबसे बड़ा काम है.

जगन मोहन कहते हैं, ''जनता जनार्दन जब श्रृद्धा सहित दर्शन और पूजा पाठ के लिए यहाँ आते हैं तो उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है शुद्ध पेयजल, रहने की व्यवस्था, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, उनकी सुरक्षा और बिजली की व्यवस्था. ये सब बातें महत्वपूर्ण होती हैं. ''

व्यवस्थाएँ
जगन मोहन के अनुसार जिला प्रशासन ने प्रस्तावित कुंभ मेले की रूप रेखा तैयार करके राज्य सरकार को भेज दिया है. इसमें गंगा और यमुना के प्रदूषण की रोक थाम, इलाहाबाद शहर और उस पार झूंसी, अरैल और फाफामऊ आदि में सड़क, पुल ओवर ब्रिज तथा अन्य नागरिक सुविधाओं का निर्माण, संगम क्षेत्र में किले के समीप पक्का घाट, बस अड्डों का विस्तार, पेय जल, सफाई, सीवर और बिजली व्यवस्था में सुधार आदि कार्य शामिल हैं.

मेले के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यातायात का संचालन होता है जिससे सब लोग स्नान भी कर सकें और भगदड़ न हो. 1954 में हुई भगदड़ में लगभग आठ सौ लोग मारे गए थे और सौ घायल हो गए.

उसके बाद से कुंभ के मुख्य स्नान पर्वों पर वीआईपी दर्जा प्राप्त लोगों के आने पर मनाही रहती है. फिर भी बड़े नेता, अफसर और जज वगैरह न केवल स्नान के लिए आना चाहते हैं, बल्कि कार से स्नान घाट या अपने वीआईपी टेंट तक जाना चाहते हैं.

मीडिया का कुँभ
इसी तरह देश विदेश के मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और फोटोग्राफर्स को संभालना भी मेला प्रशासन के लिए एक मुश्किल काम होता है.

कुंभ मेले की व्यवस्था में चालीस विभाग लगते हैं. पुलिस फ़ोर्स को मिलाकर करीब एक लाख लोग इसकी व्यवस्था संभालते हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार में नगर विकास विभाग इन सबका समन्वय करता है. विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन ने बताया कि इलाहाबाद जिला प्रशासन ने कुंभ मेले का जो बजट अनुमान भेजा है, उसे परिक्षण के लिए केन्द्रीय योजना आयोग को भेजा गया है.

आलोक रंजन के अनुसार, ''प्रारंभिक एस्टीमेट दो हजार करोड़ रूपये का बन गया है और केन्द्रीय योजना आयोग इसका परिक्षण कर रहा है. हम अपेक्षा करते हैं कि योजना आयोग भी इसमें उचित सहायता देगा क्योंकि जब हरिद्वार में पिछला कुंभ हुआ था, तो योजना आयोग से सीधे सहायता मिली थी. प्रयास कर रहे हैं कि कार्य अभी से शुरू हो जाएँ ताकि समय से यह कार्य पूरा हो सके.''

प्रदूषण के ख़िलाफ़ मुहिम
अधिकारियों के अनुसार इलाहाबाद के पिछले कुंभ में केन्द्र सरकार ने 57 करोड रूपए की आर्थिक सहायता दी थी जबकि पिछले साल हरिद्वार कुंभ में योजना आयोग ने 500 करोड़ रूपए की सहायता दी. राज्य सरकार ने फिलहाल अपने बजट में कुंभ के लिए 125 करोड़ रूपए का प्रावधान कर दिया है.

इस बजट से इलाहाबाद शहर और मेला क्षेत्र में अनेक निर्माण और विकास कार्य होंगे.

लेकिन लोगों का कहना है कि सदियों से चले आ रहे महाकुंभ मेले का मुख्य आकर्षण का त्रिवेणी संगम पर गंगोत्री यमुनोत्री से आने वाला शुद्ध जल और यहाँ का स्वच्छ पर्यावरण रहा है जिसमे लोग स्नान, ध्यान और तप कर सकें.

गंगा प्रदूषण के खिलाफ वर्षों से संघर्ष कर रहे स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी कहते हैं कि महाकुंभ मेले के लिए, ''गंगा जी ही सर्वोच्च हैं. लोग आते हैं गंगा जी के नाम पर.''

स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी शासन और प्रशासन दोनों को चेतावनी देना चाहते हैं.

वो कहते हैं, ''जहां करोड़ों संत, महात्मा और श्रृद्धालु आएंगे और जिसके लिए यहाँ आएँगे, अगर उनका अभाव रहा, उनसे दर्शन न हुआ, उनसे स्नान न हुआ और उनसे पान न हुआ तो इस प्रदूषण के लिए कोई न आएगा और न कोई दर्शन करेगा. विशेष रूप से लोग आहत होकर यहाँ से जाएंगे.''

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्रोफ़ेसर गंगा में प्रदूषण के खिलाफ जन चेतना जागृत करने का काम करते हैं.

प्रोफ़ेसर दीनानाथ शुक्ल इस बात से चिंतित हैं कि वर्तमान में गंगा और यमुना का हिमालय से आने वाला शुद्ध जल ऊपर ही रोक कर पेय जल या सिंचाई के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है.

शुक्ल कहते हैं, ''इस समय कन्नौज और कानपुर के बाद इलाहाबाद में गंगा का जो जल बह रहा है, वह शुद्ध नालों का जल है, कल कारखानों का जल है या नहरों का जल है. उसमे गंगा (गंगोत्री ) का जल है ही नही. इसलिए सबसे पहले तो उस गंगा के परिप्रेक्ष्य में विचार करने की ज़रुरत है जिसके लिए कुंभ लगता है, जो अमृत की बूँदें हैं. गंगा जीवनदायिनी है, गंगा अमृत धारा कहलाती है. कम से कम वह गंगा तो आगे आए. उसको चाहे टिहरी से छोड़ें, हरिद्वार या नरोरा से छोड़ें.''

कई संत महात्मा और नागरिक हिमालय की गंगोत्री- यमुनोत्री से आने वाला जल संगम तक लाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल करते रहे हैं और अदालत ने आदेश भी दिए. लेकिन अभी तक इस जल के उपयोग का कोई न्यासंगत और तर्कसंगत फार्मूला तय नही हो पाया.

नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन आश्वासन देते हैं कि सरकार कुंभ में आने वाले तीर्थ यात्रियों को शुद्ध गंगा जल उपलब्ध कराएगी.

आलोक कहते हैं, ''गंगाजल बिलकुल मिलेगा. इसके लिए नरोरा से अधिक से अधिक पानी छोड़ने के बारे में माननीय उच्च न्यायालय के भी आदेश हैं और हम लोग भी निर्देश दे रहे हैं. उत्तराखंड से टिहरी बाँध से भी अधिक से अधिक पानी छोड़ने के लिए हम लोग लगातार वहाँ की सरकार के संपर्क में रहते हैं. इसका हम लोग पूरा प्रबंध कर रहे हैं कि पानी उचित मात्रा में रहे और साफ़ रहे जिससे लोग स्नान कर सकें.''

दरअसल गंगा जी ही प्रयाग महाकुंभ मेले के केंद्र में रहती हैं.

पिछले कुंभ मेले के प्रबंधकों में प्रमुख इलाहाबाद के तत्कालीन कमिश्नर सदाकान्त ने अपनी प्रशासनिक रिपोर्ट में लिखा है कि वो कुंभ मेला को एक मानवीय आयोजन नही मानते.

सदाकांत के अनुसार महाकुंभ प्रयाग माँ गंगा द्वारा आयोजित एक दैवीय और आध्यात्मिक महोत्सव है इसीलिए मेले का इंतज़ाम देखने वाले अफसर हमेशा मेला निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए गंगा जी से ही प्रार्थना करते रहते हैं.

Sunday, June 3, 2012

सिंथेटिक डीएनए-पुलिस का काम आसान

ब्रिटेन के छोटे और मध्यम दुकानदारों के लिए खुशी की बात है कि उनके पास अब एक ऐसा हथियार आ गया है जो ना केवल चोरों को डराकर दूर भगा सकता है बल्कि "खतरनाक" चोरों और लूटेरों को पुलिस के हाथों पकडवाने में मददगार भी साबित हो सकता है. ब्रिटेन के दुकानदारों के पास जो नया हथियार आया है वह देखने में मामूली स्प्रे है परंतु है काफी अलग.

यह डिवाइज़
सिंथेटिक डीएनए स्प्रे करता है जो चोरों के शरीर से चिपक जाता है. इस स्प्रे को निकालना काफी मुश्किल होता है और इससे चोरों की पहचान उजागर हो जाती है. यह स्प्रे पराबैंगनी किरणों के सम्पर्क में आते ही चमकने लगता है. जिससे रात के अंधेरें में भी चोरी करने के बाद कहीं छिपे हुए चोरों को ढूंढ निकालना आसान हो जाता है.

सलेक्टाडीएनए नामक इस डिवाइज़ के अंदर एक ऐसा सोल्यूशन भरा हुआ होता है जो शरीर को कोई नुकसान तो नहीं पहुचाता परंतु उससे चिपककर सिंथेटिक
डीएनए की शृंखला बना देता है. इस डिवाइज़ को बनाने वाले एंड्रु नाइट के अनुसार इस चिपके हुए सोल्यूशन को बार बार धोने से भी यह उतरता नहीं है. इसको शरीर से उतारने में काफी समय लगता है.

परंतु यह स्प्रे नथुनों, कान के भीतर और नाखूनों के अंदर भी चला जाता है जहाँ से इसे निकालना और भी कठीन हो जाता है. और इससे
पुलिस का काम आसान हो जाता है. क्योंकि जब ऐसे किसी चोर के शरीर के ऊपर पराबैंगनी किरणें डाली जाती है तो उसके शरीर के वे हिस्से चमकने लगते हैं और इससे साबित हो जाता है कि वही चोर है.

और फिर शायद यह सब करना भी पड़े. क्योंकि यह स्प्रे चोरों को डराकर दूर रखने के लिए काफी है. लंडन के कई दुकानदारों ने अपनी अपनी दुकानों के दरवाजों पर चेतावनी वाला बोर्ड लगा दिया है कि यहाँ सलेक्टाडीएनए का इस्तेमाल होता है, इसलिए बेहतर है दूर ही रहो.

दुकानदारों को उम्मीद है कि मात्र इस चेतावनी का भी चोरों पर बड़ा मानसिक असर पड़ेगा और वे चोरी करने के लिए दुकानों में घूसने से पहले दो बार सोचेंगे

Saturday, June 2, 2012

"आई-पोड फैशन" दुर्घटनाओं को न्यौता

ब्रिटेन में प्रतिदिन होने वाली दुर्घटनाओं में से कम से कम 17 सड़क दुर्घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनके लिए म्यूज़िक प्लेयर को जिम्मेदार माना जा सकता है. यह आँकड़ा काफी बडा है और चिंताजनक भी.

आईपोड धारी वाहन चालक और फूटपाथ पर चल रहे लोगों का ध्यान मार्ग पर चल रही गतिविधियों से हटकर संगीत की तरफ आ जाता है और इससे दुर्घटनाएँ होती हैं. मोटरिंग विशेषज्ञ मानते हैं कि नया "आई-पोड फैशन" दुर्घटनाओं को न्यौता दे रहा है. कानों में लगे इयरफोन इंसान का ध्यान बांट देते हैं. इससे दिमाग की एकाग्रता कम हो जाती है.

डेली मेल की खबर के अनुसार आज अधिक से अधिक वाहन चालक, जोगर, साइकल चालक और फूटपाथ पर चलने वाले लोग मनोरंजन के लिए कार ऑडियो डिवाइज़ या आईपोड अथवा मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं. इससे वे एक वातावरण में पहुँच जाते हैं जहाँ उनकी ड्राइविंग "ऑटोपायलट" की स्थिति में आ जाती है. यही हाल फूटपाथ पर चल रहे लोगों का भी होता है, जब उन्हें पता हीं नहीं चलता कि कब वे अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच भी गए. उनके दिमाग का "ऑटो दिशा निर्देश" सिस्टम उन्हें अपने आप गंतव्य स्थान तक ले आता है और वे संगीत में ही खोए रहते हैं.

परंतु यह ऑटो सिस्टम एकाग्र नहीं होता. इससे हमें अचानक उपस्थिति होने वाले खतरे के बारे में पता नहीं चलता और उससे बचने के लिए जरूरी एकाग्रता भी ना होने से हम आसानी से दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं.

सड़क पार करते समय तेज संगीत सुनते रहने से अचानक तेजी से आ रही कार की तरफ ध्यान केन्द्रीत नहीं हो पाता और दुर्घटना हो जाती है. ऐसा ही कुछ वाहन चालकों के साथ भी होता है.

इससे भी भयावह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब राह पर चल रहे लोग अपने मोबाइल से एसएमएस करने लगते हैं या ईमेल चैक करने लगते हैं. इससे उनका ध्यान और भी अधिक विचलित हो जाता है.

इस तरह से होने वाली दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष 5% की दर से वृद्धि हो रही

स्मार्ट फोन के शिष्टाचार

अब जबकि लगभग हर हाथ में एक मोबाइल फोन जरूर होता है, इसके उपयोग के शिष्टाचार को लेकर भी किताबें और लेख लिखे जा रहे हैं. यहाँ तक कि शिष्टाचार सिखाने वाले इंस्टीट्यूट भी अब मोबाइल शिष्टाचार को अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं.

स्मार्ट फोन आपकी अपनी ऐसी दुनिया होती है जो आपको लगातार अपने मित्रों और बाकी दुनिया से जोड़े रखती है. परंतु हमें यह नही भूलना चाहिए दुनिया सिर्फ उस छोटे से डिवाइज़ तक ही सीमित नहीं है.

एमिली पोस्ट इंस्टीट्यूट की एना पोस्ट के अनुसार - यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने मोबाइल फोन को किस तरह से लेते हैं. उसमें स्विच ऑफ का बटन है और वाइब्रेशन का भी, परंतु उसका उपयोग कब और कैसे करना है यह महत्वपूर्ण है.

वैसे तो मोबाइल फोन  अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग हो सकते हैं, परंतु कुछ आम शिष्टाचार इस प्रकार से हैं.

सार्वजनिक स्थानों, अस्पतालों में मोबाइल वाईब्रेशन पर रखें:
सार्वजनिक स्थानों तथा अस्पताल जैसी जगह पर अपने मोबाइल फोन को साइलेंट या वाईब्रेशन मोड पर ही रखें. सोचिए आप अस्पताल के आईसीयू वार्ड में बैठे हों और आपके मोबाइल पर रिंगटोन के लिए चुनी गई कोई गाने की धुन बजे तो बाकी के लोगों को कैसा लगेगा.

आवाज़ धीमी रखें:
कुछ लोगों को आदत होती है कि वे एसटीडी कॉल को प्राप्त करते ही जोर जोर से बोलने लगते हैं, हालाँकि उसकी आवश्यकता नहीं है. लोकल कॉल के दरम्यान भी अपनी आवाज को धीमी ही रखें. विशेष रूप से यदि आप सार्वजनिक स्थानों पर हों तो अपनी आवाज उतनी ही रखें जितनी मात्र आपके कानों तक जाए. यदि आपको लगे की सामने वाले व्यक्ति को आवाज सुनाई नहीं दे रही तो फोन के आसपास अपने हाथों से घेरा बना लें.

किसी से बात करते समय मोबाइल का इस्तेमाल ना करें:
जब आप किसी अन्य व्यक्ति के साथ बातचीत या चर्चा कर रहें हों तो अपने मोबाइल का इस्तेमाल टाल दें. फोन को स्विच ऑफ कर दें या फिर साइलेंट. यदि कोई बहुत ही महत्वपूर्ण कॉल आ जाए तो कॉल उठाने के लिए थोड़ी दूर चले जाएँ और इसके लिए सामने बैठे व्यक्ति से क्षमा मांगे. कॉल को जल्द से जल्द खत्म कर वापस आएँ. कम महत्वपूर्ण कॉल को अनदेखा कर सकते हैं या फिर पहले से तैयार एसएमएस टेम्पलेट का उपयोग कर ऐसे कॉल करने वाले लोगों को संदेश भेज सकते है कि आप व्यस्त हैं, बाद में कॉल करेंगे.

धार्मिक स्थानों पर मोबाइल बंद कर दें:
धार्मिक स्थानॉं जैसे कि मंदिर में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो आपकी मनपसंद रिंगटोन को सुनने में रूचि रखता होगा. इसलिए बेहतर होगा आप मोबाइल फोन को साइलेंट रखें. वाईब्रेशन मोड से भी किसी को परेशानी हो सकती है.

अन्य लोगों के बीच अपनी रिंगटोन ना बजाएँ:
यदि आप अपने मित्रों के इतर कुछ नए लोगों से मिल रहे हैं तो अपने मोबाइल की रिंगटोन को बदल कर कोई सामान्य धुन रख लें. यकीन मानिए लोगों किसी दूसरे के मोबाइल पर बजी गानों पर आधारित रिंगटोन सुनना अच्छा नहीं लगता.

विद्यालयों में मोबाइल फोन बंद रखें:
यदि आप विद्यार्थी हैं तो अपने स्कूल-कॉलेज में क्लास के सत्र के दौरान मोबाइल स्विच ऑफ कर दें. अधिकतर स्कूलों और कॉलेजों में पहले से यह नियम लागू है, यदि आपके कॉलेज में यह नियम ना भी लागू हो तो भी आप इसे अमल में ला सकते हैं. मोबाइल स्विच ऑफ होगा तो आपके मन में कोई गेम खेलने का विचार भी नहीं आएगा और आप पढाई में ध्यान लगा पाएंगे