Wednesday, October 24, 2012

शक्ति पूजन की प्रासंगिकता

आज से सौ वर्ष पहले श्रीअरविंद ने अपनी छोटी सी रचना भवानी मंदिर की भूमिका में लिखा था- हमने शक्ति को छोड़ दिया है और इसलिए शक्ति ने भी हमें छोड़ दिया है। श्रीअरविंद ने जब यह लिखा तब हम भारतवासी अंग्रेजों की अधीनता में रह रहे थे। पराधीनता में रहना हमारी दुर्बलता का ही परिणाम था। हमारे अनेक महापुरुष इस बिंदु पर लिखते-बोलते रहे थे कि सदियों की पराधीनता में हमारी शक्ति और क्षीण होती गई, जिससे मुक्त होना सर्वाधिक आवश्यक है। महाराष्ट्र में गणपति उत्सव, बंगाल में कालीपूजा और दुर्गापूजा का नवोन्मेष इसी भावना का प्रतिफलन था। स्वामी विवेकानंद ने हिंदुओं को बलवान, निर्भीक होने का उपाय करने के लिए हर तरह से प्रेरित किया था। उन्होंने तथा रवींद्रनाथ टैगोर, श्रीअरविंद जैसे अनेक मनीषियों ने इसे अंग्रेजों को भगाने से भी अधिक आवश्यक कार्य समझा था। उस कार्य की आज क्या स्थिति है? कहना होगा कि स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। अंग्रेजों के जाते ही हमारे राज्यकर्मी वर्ग को इतना निर्बल व संकल्पहीन समझा गया कि बाएं-दाएं विदेशी आक्रमण, अतिक्रमण होने लगे। यह स्थिति विगत डेढ़ सौ वर्ष के अंग्रेजी शासन में नहीं हुई थी। इसका कोई अर्थ है! शांति, अहिंसा और भाईचारे की बातों से राज-काज नहीं चलता।
स्वतंत्र भारत के भारतीय नेताओं को यह समझ आने से पहले लाखों निरीह नागरिकों और सैनिकों की बलि चढ़ गई! हमारी नई पीढि़यों से 1947 से 1962 के बीच का यह कटु इतिहास विशेषत: छिपाया गया है। इसी बनाव-छिपाव का दूसरा घातक परिणाम यह हुआ है कि राजनीतिक-बौद्धिक क्षेत्र में अज्ञानता के साथ कायरता और पाखंड का प्रसार भी होता गया। इससे विशेष कर बुद्धिजीवी वर्ग ग्रस्त है। विश्वविद्यालय और मीडिया क्षेत्र में यह विविध रूपों में प्रदर्शित होता रहता है। प्रचार तंत्र के सहारे इस बात को 'विचारधारा' के आवरण में छिपाकर सामान्य जन को भ्रमित रखा जा रहा है। कश्मीर, असम, बांग्लादेश, आतंकवाद से जुड़े सभी प्रसंगों पर हमारे बुद्धिजीवी और नेता जानते-बूझते झूठी बातें बढ़-चढ़ कर पेश करते हैं और असली बातें छिपाते हैं। इसमें भीरुता मुख्य कारण है। यशपाल की एक कहानी है 'फूलो का कुर्ता'। उसमें छोटी-सी अबोध गरीब बालिका है। उसके शरीर पर एकमात्र वस्त्र उसकी फ्रॉक है। किसी प्रसंग में लच्जा बचाने के लिए वह वही फ्रॉक उठाकर अपना मुंह ढक लेती है। कहना चाहिए कि हर कठिन मुद्दे पर हमारा बौद्धिक-राजनीतिक वर्ग अपनी लच्जा उसी बालिका के समान ढकता है। वह जब-तब मनमानी हत्या और हिंसा के संगठित अभियान चलाने वालों को दुखी, पीड़ित बताकर किसी और की आलोचना करने में कलम तोड़ने लगता है।
राजनीतिक शक्ति-संतुलन में यथास्थिति नहीं होती। यदि आप अनुचित दबाव रोकने के लिए सचेष्ट नहीं तो वह बढ़ता जाएगा। एकतरफा सद्भाव और एकतरफा सेक्यूलरिच्म उसी बालिका की तरह हिंदू भारत की लच्जा छिपा रही है। यह पूरी स्थिति देश के अंदर और बाहर वाले बिगड़ैल बखूबी जानते हैं, जबकि हमारे नेता, बुद्धिजीवी दिखाते हैं कि उन्होंने चतुराई दिखा कर दुनिया के सामने अपनी लच्जा बचा ली। उन्हें लगता है कि किसी ने नहीं देखा कि वे हिंसा तथा उग्रवादियों का दबाव स्वीकार कर रहे हैं- सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों रूपों में। यह लच्जा छिपती नहीं, बल्कि और उजागर होती है। हर प्रकार के संगठित उग्रवाद के समक्ष गोल-मोल बातें करना, झूठी भंगिमा बनाकर उत्पीड़क को ही उत्पीड़ित बताते हुए लफ्फाजी करना अत्यंत लच्जास्पद है, क्योंकि दुनिया भर में वास्तविक राजनीति, कूटनीति चलाने वाले हमारी दुर्बलता प्रत्यक्ष देख रहे हैं। यह कठोर सत्य है कि किसी समाज के नेतृत्व की दुर्बलता अंतत: सामाजिक दुर्बलता में बदल जाती है। हमारे राजनीतिक-बौद्धिक नेता संपूर्ण भारत को जाने-अनजाने उसी दिशा में धकेल रहे हैं। इसे पंजाब, बंगाल और कश्मीर के हश्र से देखा जा सकता है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर की एतिहासिक पुस्तक 'पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में सामाजिक शक्ति-संपन्नता और सामाजिक भीरुता, दोनों प्रवृत्तियों की संपूर्ण मन:स्थिति और परस्पर नीति अच्छी तरह प्रकाशित है। आज के भारत में पुन: वही दोहराया जा रहा है। मगर अब ऐसी पुस्तकों से भी बचने की कोशिश होती है। केवल गांधीजी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' लहराई जाती है, जिसमें लिखा है कि आत्मबल सबसे बड़ी चीज है। यह सब अज्ञान और कायरता छिपाने के बहाने बन जाते हैं। दब्बूपन को भलमनसाहत का रूप देने की खुली कवायद। जिससे अराजक तत्व और शह पाते हैं। यह प्रक्रिया सौ साल से कमोबेश यथावत है। हमारी अनेक समस्याओं की जड़ यही है। आज नहीं तो कल, हमें यह शिक्षा लेनी पड़ेगी कि भले लोगों को बलवान व चरित्रवान भी होना चाहिए। दुष्टता को सहना या आंखें चुराना दुष्टता को प्रोत्साहन है। रामायण और महाभारत ही नहीं, यूरोपीय चिंतन में भी यही शिक्षा है। हमारे मनीषियों ने तो विद्या की देवी को भी शस्त्र-सच्जित रखा था और हमने शक्ति की देवी को भी मिट्टी की मूरत में बदल कर रख दिया है। तामझाम से बिजली-बत्ती कर देना, लाखों रुपये की सजावट कर देना दुर्गा-पूजा या शक्ति-पूजा नहीं। पूजा है किसी संकल्प के लिए शक्ति-आराधन करना। सम्मान से जीने के लिए मृत्यु का वरण करने के लिए भी तत्पर होना। किसी तरह चमड़ी बचाकर नहीं, बल्कि दुष्टता का साहस से सामना करते हुए जीने की रीति बनाना। यही वह शक्ति-पूजा है जिसका आह्वान हमारे महापुरुषों ने किया था। उसकी प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गई है।

Thursday, July 5, 2012

मुठभेड़ पर राजनीति

छत्तीसगढ़ में 28/29 जून की रात को सुरक्षाबलों की माओवादियों से मुठभेड़ पर अच्छा-खासा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप लगाया जा रहा है कि सीआरपीएफ के जवानों ने निर्दोष गाव वालों की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी। मरने वालों में जिनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे। स्वामी अग्निवेश ने माग की है कि इसके लिए केंद्रीय गृहमंत्री को बर्खास्त किया जाए और प्रधानमंत्री घटना के लिए जनजातियों से क्षमा मागें। दुर्भाग्य से देश में हर मुद्दे पर राजनीति होने लगी है और इसका स्तर इतना गिर गया है कि आरोप-प्रत्यारोप के बीच सत्य गुम हो जाता है। संदर्भित मुठभेड़ के बारे में भी कुछ ऐसा ही हुआ। घटनाक्रम का संक्षेप में विवेचन सच्चाई पर पहुंचने के लिए आवश्यक होगा। छत्तीसगढ़ पुलिस और सीआरपीएफ को गोपनीय सूचना मिली कि माओवादियों की पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी यानी पीएलजीए की एक टुकड़ी ओडिशा की ओर से छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर रही है और वह किसी बड़ी घटना को अंजाम देगी। सूचना मिलने पर राज्य पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने संयुक्त योजना बनाई, जिसके अंतर्गत सुरक्षाबलों की तीन टुकड़िया अलग-अलग स्थानों से 28 जून की रात को निकलीं। इनमें से पहली टुकड़ी जनपद बीजापुर के बासगुडा क्षेत्र से निकली और इसका गंतव्य स्थान सिलगर ग्राम था। इस टुकड़ी पर आधी रात के समय, जब वह ग्राम सारकेगुडा से गुजर रही थी, माओवादियों ने फायरिंग की। जैसा कि बाद में मालूम हुआ, उस रात को सारकेगुडा में तीन अन्य गावों-कोठगुडा, राजपेटा और कोरसागुडा से ग्रामीण एकत्रित हुए थे। माओवादी भी काफी संख्या में वहा मौजूद थे। फायरिंग में सीआरपीएफ के छह जवान घायल हो गए, जिनमें से दो की हालत नाजुक है। एक जवान के सीने में गोली लगी और दूसरे के जबड़े से गोली पार हो गई। सीआरपीएफ ने जवाबी फायरिंग की। यह इतनी प्रभावी थी कि कुछ ही देर में माओवादी शात हो गए। गोलीबारी करीब एक घटे चली। मुठभेड़ के बाद सीआरपीएफ ने रात को ही एंबुलेंस से घायल सिपाहियों को बीजापुर भेजा, जहा से उन्हें हेलीकॉप्टर द्वारा इलाज के लिए रायपुर ले जाया गया। उल्लेखनीय है कि दो घायल माओवादियों को भी हेलीकॉप्टर से इलाज के लिए भेजा गया। दूसरे दिन पौ फटने के बाद सीआरपीएफ ने घटनास्थल की छानबीन की तो उन्हें 16 संदिग्ध माओवादियों के शव मिले। यानी मुठभेड़ के करीब चार घटे बाद उन्हें आशिक सफलता का आभास हुआ। इसके पहले रात में उनका यही ख्याल था कि मुठभेड़ में माओवादियों का पलड़ा भारी रहा। अब सवाल यह उठता है कि जब सीआरपीएफ पर सारकेडा ग्राम से माओवादियों ने गोली चलाई तो सुरक्षाबलों के पास क्या विकल्प था? एक केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि सुरक्षाबलों को फायरिंग से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि ग्रामीणों में औरतें या बच्चे तो नहीं हैं। आधी रात के समय जब एक तरफ से गोली चलनी शुरू हो गई हो तब यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकता था, समझ के बाहर है। इस संदर्भ में हमें दो बातें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए। एक तो यह कि जवाबी कार्रवाई में दुर्भाग्य से कुछ बेगुनाह लोगों के मारे जाने की आशका बनी रहती है। सुरक्षाबलों का प्रयास होना चाहिए कि ऐसा यथासंभव न हो और यदि होता है तो कम से कम लोगों की जान जाए। दूसरी बात, जो अकाट्य तथ्य है कि माओवादियों में बड़ी संख्या में महिलाएं और लड़किया भी शामिल हैं। इसके अलावा जैसा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में भी उल्लखित है, माओवादी जबरन नाबालिग लड़कों को अपनी वाहिनी में भर्ती करते हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि सीआरपीएफ ने कुछ मृतकों का गला धारदार हथियार से रेता और महिलाओं के साथ दु‌र्व्यवहार और दुष्कर्म भी किया। यह आरोप सरासर बेबुनियाद है। मुठभेड़ में जितने भी व्यक्ति मारे गए उन सभी का बीजापुर सिविल अस्पताल के मेडिकल ऑफिसर के नेतृत्व में चार डॉक्टरों की एक टीम ने पोस्टमार्टम किया। किसी भी शव पर धारदार हथियार से रेतने या काटने के निशान नहीं हैं। महिलाओं के साथ दु‌र्व्यवहार की बात सुरक्षाबलों को केवल बदनाम करने की नीयत से कही जा रही है। सच तो यह है कि सबेरा होने तक सुरक्षाबल रक्षात्मक मानसिकता में ही थे। सीआरपीएफ की तीनों टुकड़ियों द्वारा मारे गए 20 संदिग्ध माओवादियों में से सात का आपराधिक इतिहास मालूम हो चुका है, शेष के बारे में अभी छानबीन की जा रही है। फिर भी यह बात भी अपनी जगह सही है कि एक युवती और दो लड़के और संभवत: कुछ बेगुनाह ग्रामीण भी मारे गए। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। सीआरपीएफ की जवाबी कार्रवाई में कोई विद्वेष या बदनीयती की भावना नहीं थी। अगर सुरक्षाबलों द्वारा बर्बरता की गई होती तो दो माओवादियों को इलाज के लिए रायपुर भेजने की बजाय उन्हें गोली से उड़ा दिया गया होता। यह भी उल्लेखनीय है कि सीआरपीएफ के पास रॉकेट और मोर्टार भी थे, परंतु उन्होंने मुठभेड़ में इनका प्रयोग नहीं किया। शायद इसकी आवश्यकता नहीं समझी गई। इससे पता चलता है कि सीआरपीएफ की तरफ से फायरिंग में संयम बरता गया। काग्रेस में अंतर्विरोध के कारण घटना ने ज्यादा तूल पकड़ा। अलग-अलग मंत्री अलग- अलग राग अलाप रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के काग्रेसियों को तो भाजपा की खिलाफत के लिए नक्सलियों की वकालत से भी परहेज नहीं है। उनका अंतिम लक्ष्य भाजपा को बेदखल करके सत्ता हथियाना है। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि काग्रेस का एक वर्ग चिदंबरम को गृहमंत्री के रूप में सफल होते नहीं देखना चाहता। प्रधानमंत्री को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नीति संबंधी विषयों पर पार्टी के सभी प्रतिनिधि एक सुर में बोलें, परंतु ऐसा करने में वह अपने आपको अक्षम पाते हैं। काग्रेस की यह अंदरूनी राजनीति देश के लिए अत्यंत अशुभ है। संप्रग सरकार माओवादी समस्या का समाधान चाहते हुए भी इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाना चाहती। यह स्थिति देश के लिए बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण है।

Wednesday, June 6, 2012

2009 की राजनीति --वाममोर्चा -यूपीए गठबंधन-एक निहितार्थ


वर्ष 2008 और वर्ष 2009 में केंद्रीय राजनीति के परिदृश्य में जो नहीं बदला वह यह है कि यूपीए गठबंधन ही सत्ता संभाल रहा है. लेकिन जो दृश्य बदल गया है वह यह है कि यूपीए की गठबंधन सरकार को अब वाममोर्चा का समर्थन नहीं है.

इस पर एक नज़रिया यह है कि यूपीए की नीतियों और निर्णयों पर नज़र रखने वाला वाममोर्चा इस बार नहीं है और दूसरा नज़रिया यह है कि यूपीए सरकार के हर काम में अडंगा लगाने वाले वामपंथियों को वर्ष 2009 के आम चुनाव ने हाशिए पर डाल दिया.

इसमें से जिस भी नज़रिए से सहमत हुआ जाए, इसका निहितार्थ एक ही है कि 2009 की राजनीति ने 32 साल से पश्चिम बंगाल में शासन कर रहे वाममोर्चा के क़िले में दरार डाल दी है.

चुनाव से पहले लोकसभा में वाममोर्चा के 57 सांसद हुआ करते थे और नई लोकसभा में उनकी संख्या घटकर 22 रह गई है. और ऐसा नहीं है कि उनकी ताक़त सिर्फ़ लोकसभा में कम हुई है, पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी जो कुछ हो रहा है, उसने भी संकेत दिए हैं कि वर्ष 2011 में होने वाले विधानसभा के चुनाव उनके लिए कठिन साबित होने वाले हैं.

2004 के लोकसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से 35 सीटें वाममोर्चा के पास थीं, लेकिन 2009 के चुनाव में वे सिर्फ़ 15 सीटें जीत सके.

इसके बाद राज्य में 16 नगर निकायों के चुनाव हुए जिसमें से 13 पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की. इससे पहले वाममोर्चा इनमें से 11 पर शासन कर रहा था. पंचायत चुनावों में भी वाममोर्चा को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए तो आठ सीटों पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की. वाममोर्चे का नेतृत्व करने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) को एक भी सीट नहीं मिली. वाममोर्चे की ओर से एकमात्र जीत मिली फ़ॉरवर्ड ब्लॉक को.

वैसे राज्य की राजनीति में साल प्रारंभ होते ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी जब नंदीग्राम में वाममोर्चा के एक अहम भागीदार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को तृणमूल कांग्रेस ने शिकस्त दी.

भूमि-सुधार की हिमायती रहे वाममोर्चा ने जब सिंगुर और नंदीग्राम में भूमि-सुधार के एकदम दूसरे सिरे पर जाकर उद्योगों के लिए ज़मीन देने का फ़ैसला किया तो उनके अपने काडर को यह नागवार गुज़रा. बहुत से लोगों को लगता था कि ममता बैनर्जी ने टाटा के नैनो परियोजना को राज्य से बाहर भेजकर राज्य का बहुत नुक़सान किया है लेकिन चुनाव परिणामों ने ज़ाहिर कर दिया कि इस बुद्धिजीवी सोच से मतदाताओं की सोच एकदम अलग है.

दूसरी ओर सिंगूर और नंदीग्राम में सुनियोजित हिंसा के जो आरोप लगे उसे धोना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.

वैसे पश्चिम बंगाल में एक नया परिवर्तन यह दिखा कि कलाकार और रचनाकार कभी संस्कृति पुरुष कहे जाने वाले बुद्धदेव के ख़िलाफ़ खड़े हो गए और फ़िल्म समारोह तक का बहिष्कार हुआ.

चुनाव परिणामों ने स्वाभाविक रुप से वाममोर्चा के घटक दलों के बीच भी मतभेद पैदा कर दिए हैं और अब सहयोगी दल ही सीपीएम काडर और उसके नेताओं की कार्यप्रणाली पर उंगलियाँ उठाने लगे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मानिनी चटर्जी कहती हैं, “पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो कुछ भी दिख रहा है कि वह ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी की जीत से अधिक वाममोर्चे की हार है.”

वे मानती हैं कि वर्ष 2009 के घटनाक्रम ने पार्टी के नेताओं के भीतर हताशा पैदा कर दी है. वे कहती हैं, “पश्चिम बंगाल में वामपंथी नेता जिस तरह से बर्ताव कर रहे हैं, उससे लगता है कि नेता पहले ही हार मान चुके हैं. उनका विश्वास बिखर गया है.”

हालांकि वे मानती हैं कि चुनाव की राजनीति में डेढ़ साल बहुत होते हैं और हो सकता है कि वाममोर्चा 2011 के विधानसभा के पहले अपना घर संभाल ले.

लेकिन ऐसा होने की संभावना कम ही दिखती है.

क्योंकि जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ़ पश्चिम बंगाल में ही नहीं हो रहा है. केरल, जहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन और सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन बारी-बारी से सत्ता में आता रहा है, स्थिति बहुत अलग नहीं दिख रही है.

वहाँ मुख्यमंत्री अच्युतानंदन और सीपीएम के राज्य इकाई के सचिव पिनरई विजयन के बीच जो विवाद हुआ उसने भी पार्टी की अंदरुनी स्थिति को बयान किया.

निश्चित तौर पर वामपंथी दलों के भीतर असमंजस की स्थिति है. और जैसा कि मानिनी चटर्जी कहती हैं कि यह दुविधा भाजपा की दुविधा से बड़ी है

मीटर गैज-ब्रोड गैज---रेलवे सिस्टम

भारत में आज भी रेलगाडियाँ कई अलग अलग माप के ट्रेक पर चलती है - जैसे कि ब्रोड गैज, मीटर गैज, नैरो गैज आदि.. परंतु सर्वमान्य ट्रेक अब ब्रोड गैज हो गया है. कई अन्य तकनीकों की तरह भारत का रेलवे सिस्टम भी अंग्रेजो के द्वारा ही विकसित किया गया था और उस जमाने के हिसाब से उसे मान्यता दी गई थी. तो फिर ब्रोड गैज और मीटर गैज के माप किस तरह से तय किए गए? आइए जानते हैं -

मीटर गैज -

1869 में लोर्ड मेयो ने जो कि भारत के वायसरॉय थे, एक फरमान जारी किया था कि भारत में भी रेलवे सिस्टम होना चाहिए और ट्रेन के डिब्बे में 4 व्यक्ति आराम से बैठ सकें इसलिए उसकी चौड़ाई 6 फूट 6 इंच होनी चाहिए. ट्रेन के ट्रेक का माप उसके 50% से कम नहीं होना चाहिए यानी कि 3 फूट 3 इंच. इसको मिलीमीटर में बदलने पर माप आता है 990 मिमी.

अंग्रेज उस समय भारत में मैट्रिक पद्धति ला रहे थे, इसलिए उन्होनें ट्रेक का माप सुविधा के लिए 1000 मिमी. यानी 1 मीटर कर दिया और इस तरह बना मीटर गैज ट्रेक का माप. भारत ने भी 1957 में माप की मैट्रिक प्रणाली को अपना लिया. भारत में आज 11,000 किमी से अधिक के ट्रेक मीटर गैज ही हैं.

ब्रोड गैज -

भारत में ब्रोड गैज ट्रेक का माप 5.5 फूट का होता है परंतु इंग्लैंड में जो स्टैंडर्ड गैज अपनाया गया था उसके ट्रेक का माप थोडा विचित्र यानी कि 4 फूट 8.5 इंच था. प्रश्न यह है कि इंग्लैंड ने इतने अटपटे माप को क्यों अपनाया? इसका जवाब इतिहास मे मिलता है. रोमन लोग अपने रथों के पहियों के बीच की दूरी को 4 फूट 8.5 इंच पर ही रखते थे, क्योंकि दो घोडों को आपस में टकराए बिना एक साथ दौडते रहने के लिए एक दूसरे से कम से कम इतना दूर होना जरूरी होता है.

रोमनों ने जब इंग्लैंड पर कब्जा किया तो उन्होनें वहाँ के मार्गों पर भी अपने रथ दौड़ाए. समय बीतने पर अंग्रेजों ने उसी माप की बग्गी बनाई और वर्षों तक उसका इस्तेमाल किया. इसके बाद पहले वाष्प इंजिन को जब बनाया गया तो उसका माप भी यही था. अंत में ज्योर्ज स्टीफंस ने पहला रेल इंजिन रॉकेट बनाया और उसकी चौड़ाई भी यही थी

Monday, June 4, 2012

गोमती नदी -सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट -एक गंदी झील और बीमारियों का कारण

 लखनऊ में एशिया का सबसे बड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चालू होने के बावजूद शहर में गोमती नदी का पानी साफ़ न होने से लोगों का ध्यान शहर की निचली धारा में बने बैराज की तरफ़ गया है.

इस बैराज के कारण गोमती लखनऊ में एक गंदी झील और बीमारियों का कारण बनकर रह गयी है. जानकार लोगों का कहना है कि नदी को साफ़ रखने के लिए उसका प्राकृतिक बहाव नही रोकना चाहिए.

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक़ ट्रीटमेंट प्लांट चालू होने के दो हफ्ते बाद 31 जनवरीको भैन्साकुंड बैराज के पास गोमती के पानी में घुलित ऑक्सीजन मात्र चार दशमलव पांच मिलीग्राम प्रति लीटर था .

एक साल पहले भी बैराज के पास घुलित ऑक्सीजन इतनी ही कम थी. देखने में भी पानी का रंग वैसा ही मटमैला है.

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक वरिष्ठ अधिकारी डाक्टर मधु भारद्वाज कहती हैं, "बैराज के पहले जो पानी रुक जाता है उसका सारा पानी की क्वालिटी पर पड़ता है, क्योंकि जब नदी बह रही होती है तो उसका स्वयं शुद्धिकरण का एक सिस्टम होता है और इसलिए बैराज के पास बहाव रुकने से नदी तालाब की तरह हो जाती है.बैराज के ऊपर कई नाले गिरते हैं,उसकी गंदगी भी रुकती है, जिसका असर पानी की क्वालिटी पर पड़ता है."

डॉक्टर मधु कहती हैं कि, "गर्मियों में हालत और ख़राब हो जाते हैं.कई बार बैराज के पास ऑक्सीजन लगभग शून्य हो जाती है. तब हम व्यक्तिगत रूप से प्रयास करते हैं कि बैराज के फाटक खुल जाएँ और गन्दगी निकल जाए."

प्रदूषण के कारण गोमती में मछलियों की संख्या बहुत कम हो गयी है. ऑक्सीजन कम होने से अक्सर बची खुची मछलियाँ भी दम घुटने से मर जाती हैं.

भैन्साकुंड शमसान घाट के पास बने इस बैराज का मकसद ऊपरी धारा में करीब 12 किलोमीटर दूर गऊ घाट पम्पिंग स्टेशन पर शहर की पेयजल सप्लाई के लिए पानी का स्तर बनाए रखना है.

प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट
प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार गोमती जब लखनऊ के गऊ घाट पर प्रवेश करती है, तब घुलित ऑक्सीजन की मात्रा दस से बारह मिलीग्राम प्रति लीटर होती है, यानि नदी का पानी साफ़ और पीने योग्य होता है.

लेकिन गऊ घाट से भैन्साकुंड के बीच इसी 12 किलोमीटर के भीतर शहर के डेढ़ दर्जन नाले सीवेज और कूडा कचरा लेकर नदी में मिलते हैं.

बैराज के फाटक अकसर बंद रहने से नदी का बहाव बंद रहता हैं.बैराज के पास 'सिल्ट' और गंदगी जमा होती है और सड़ते सीवर में घातक विषाणु,
जीवाणु पैदा होते हैं. कभी-कभी ये गंदगी वापस गऊ घाट तक पहुँचती है,जहां से शहर के पेयजल की सप्लाई होती है.

बैराज के पास में रहने वाले गोपाल कहते हैं कि बीस पचीस साल पहले यहाँ गोमती का पानी इतना साफ़ था कि नदी में सिक्का फेंक दो, तो उठा लें. अब नालों की गंदगी आने और बैराज का फाटक बंद होने से सिल्ट और गंदगी जमा रहती है.

बदबू,मच्छरों और कीड़े मकोड़ों से आसपास की आबादी का जीवन मुश्किल में है. यहीं पास में शमसान घाट है,जहां नदी एक गंदी झील के रूप में है और उसी गंदे पानी से लोग अंतिम संस्कार की औपचारिकताएं पूरी करते हैं. बैराज के उस पार नदी की धारा अक्सर बहुत पतली और सूखी रहती है.

लखनऊ के मेयर डाक्टर दिनेश शर्मा कहते हैं कि, "बैराज के कारण दस ग्यारह किलोमीटर नदी में पानी के ठहराव के कारण 'सिल्ट' और गंदगी जमा होने एक तो पानी प्रदूषित हो जाता है. दूसरे वह छेद भी बंद हो गए जो पानी के स्रोत हैं और जिनसे नदी नीचे से पानी रिचार्ज करती है.''

श्री शर्मा कहते हैं कि बैराज को गऊ घाट वाटर वर्क्स के पास ही शिफ्ट कर देना चाहिए ताकि नदी का बहाव बहाल हो और शहर को शुद्ध पेयजल भी मिलता रहे.

गोमती नदी पीलीभीत में माधो टांडा के पास एक झील से निकलकर बनारस के पास गंगा में मिलती है.लखनऊ से पहले जंगलों के कम होने और गन्ने की खेती के लिए पानी की अधिक खपत के चलते गोमती में पानी लगातार कम होता गया है.

'कुछ करना होगा'
राज्य जल अभिकरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ गोमती का जल प्रवाह पिछले तीस वर्षों में घटकर पैंतीस फीसदी रह गया है. वर्ष 1979 में लखनऊ में गोमती का औसत जल प्रवाह 4238 क्यूसेक था, जो वर्ष 2008 में घटकर मात्र 1448 रह गया है.

लेकिन जल निगम ने लगभग तीन सौ करोड रूपये लागत की जो प्रदूषण नियंत्रण योजना तैयार की थी,उसमे न तो गोमती जल ग्रहण क्षेत्र में जल संरक्षण की कोई योजना थी और न ही उसका बहाव बहाल करने की .

नगर विकास और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन मानते हैं, "नदी को बहना तो बहुत जरूरी है, नहीं तो प्रदूषण बढ़ जाता है. बहाव तो नदी में होना ही चाहिए."

आलोक रंजन कहते हैं कि इस मामले में कुछ करना होगा.

श्री रंजन कहते हैं कि शहर के सभी नाले जब 'डाइवर्ट' होकर भरवारा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में जाएंगे तब नदी का प्रदूषण खत्म हो जाएगा. अभी केवल कुकरैल और हैदर कैनाल को ही भरवारा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में डाइवर्ट किया गया है.

लेकिन जानकार कहते हैं कि गोमती नदी को पुनर्जीवन देने के लिए उसके समूचे जलग्रहण क्षेत्र पर ध्यान देना होगा और लखनऊ में बैराज का स्वरुप बदलकर ऎसी तकनीक अपनानी होगी जिससे गऊ घाट वाटर वर्क्स पर पेयजल के लिए पानी लेने के बाद जलधारा में रुकावट न आये और नदी अविरल बहती रहे

कुंभ की तैयारियां शुरू

 इलाहाबाद के संगम तट पर होने वाला महाकुंभ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक मेला होता है. प्रयाग में अगला महाकुंभ दिसंबर 2012 और जनवरी 2013 में होना है.

इतने बड़े मेले के आयोजन में ढेर सारी व्यवस्था करनी होती है. इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी से अगले कुंभ की तैयारियां शुरू कर दी हैं.

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ 12 साल पहले वर्ष 2001 में सदी के पहले महाकुंभ के दौरान एक महीने में कुल मिलाकर करीब आठ करोड़ लोगों ने गंगा स्नान किया था. दुनिया के कोने कोने से आए थे ये लोग.

लाखों लोगों के लिए गंगा और यमुना के संगम पर रेत और कछार में टेंट का अस्थायी नगर बसाकर कुंभ मेले की व्यवस्था करना अपने आप में एक बड़ा चुनौती भरा कार्य है. इसलिए कुंभ मेले की तैयारी तीन साल पहले शुरू हो जाती है.

इलाहाबाद के कमिश्नर पीवी जगन मोहन कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों की सुख सुविधा का बन्दोबस्त करना सबसे बड़ा काम है.

जगन मोहन कहते हैं, ''जनता जनार्दन जब श्रृद्धा सहित दर्शन और पूजा पाठ के लिए यहाँ आते हैं तो उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है शुद्ध पेयजल, रहने की व्यवस्था, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, उनकी सुरक्षा और बिजली की व्यवस्था. ये सब बातें महत्वपूर्ण होती हैं. ''

व्यवस्थाएँ
जगन मोहन के अनुसार जिला प्रशासन ने प्रस्तावित कुंभ मेले की रूप रेखा तैयार करके राज्य सरकार को भेज दिया है. इसमें गंगा और यमुना के प्रदूषण की रोक थाम, इलाहाबाद शहर और उस पार झूंसी, अरैल और फाफामऊ आदि में सड़क, पुल ओवर ब्रिज तथा अन्य नागरिक सुविधाओं का निर्माण, संगम क्षेत्र में किले के समीप पक्का घाट, बस अड्डों का विस्तार, पेय जल, सफाई, सीवर और बिजली व्यवस्था में सुधार आदि कार्य शामिल हैं.

मेले के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यातायात का संचालन होता है जिससे सब लोग स्नान भी कर सकें और भगदड़ न हो. 1954 में हुई भगदड़ में लगभग आठ सौ लोग मारे गए थे और सौ घायल हो गए.

उसके बाद से कुंभ के मुख्य स्नान पर्वों पर वीआईपी दर्जा प्राप्त लोगों के आने पर मनाही रहती है. फिर भी बड़े नेता, अफसर और जज वगैरह न केवल स्नान के लिए आना चाहते हैं, बल्कि कार से स्नान घाट या अपने वीआईपी टेंट तक जाना चाहते हैं.

मीडिया का कुँभ
इसी तरह देश विदेश के मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और फोटोग्राफर्स को संभालना भी मेला प्रशासन के लिए एक मुश्किल काम होता है.

कुंभ मेले की व्यवस्था में चालीस विभाग लगते हैं. पुलिस फ़ोर्स को मिलाकर करीब एक लाख लोग इसकी व्यवस्था संभालते हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार में नगर विकास विभाग इन सबका समन्वय करता है. विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन ने बताया कि इलाहाबाद जिला प्रशासन ने कुंभ मेले का जो बजट अनुमान भेजा है, उसे परिक्षण के लिए केन्द्रीय योजना आयोग को भेजा गया है.

आलोक रंजन के अनुसार, ''प्रारंभिक एस्टीमेट दो हजार करोड़ रूपये का बन गया है और केन्द्रीय योजना आयोग इसका परिक्षण कर रहा है. हम अपेक्षा करते हैं कि योजना आयोग भी इसमें उचित सहायता देगा क्योंकि जब हरिद्वार में पिछला कुंभ हुआ था, तो योजना आयोग से सीधे सहायता मिली थी. प्रयास कर रहे हैं कि कार्य अभी से शुरू हो जाएँ ताकि समय से यह कार्य पूरा हो सके.''

प्रदूषण के ख़िलाफ़ मुहिम
अधिकारियों के अनुसार इलाहाबाद के पिछले कुंभ में केन्द्र सरकार ने 57 करोड रूपए की आर्थिक सहायता दी थी जबकि पिछले साल हरिद्वार कुंभ में योजना आयोग ने 500 करोड़ रूपए की सहायता दी. राज्य सरकार ने फिलहाल अपने बजट में कुंभ के लिए 125 करोड़ रूपए का प्रावधान कर दिया है.

इस बजट से इलाहाबाद शहर और मेला क्षेत्र में अनेक निर्माण और विकास कार्य होंगे.

लेकिन लोगों का कहना है कि सदियों से चले आ रहे महाकुंभ मेले का मुख्य आकर्षण का त्रिवेणी संगम पर गंगोत्री यमुनोत्री से आने वाला शुद्ध जल और यहाँ का स्वच्छ पर्यावरण रहा है जिसमे लोग स्नान, ध्यान और तप कर सकें.

गंगा प्रदूषण के खिलाफ वर्षों से संघर्ष कर रहे स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी कहते हैं कि महाकुंभ मेले के लिए, ''गंगा जी ही सर्वोच्च हैं. लोग आते हैं गंगा जी के नाम पर.''

स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी शासन और प्रशासन दोनों को चेतावनी देना चाहते हैं.

वो कहते हैं, ''जहां करोड़ों संत, महात्मा और श्रृद्धालु आएंगे और जिसके लिए यहाँ आएँगे, अगर उनका अभाव रहा, उनसे दर्शन न हुआ, उनसे स्नान न हुआ और उनसे पान न हुआ तो इस प्रदूषण के लिए कोई न आएगा और न कोई दर्शन करेगा. विशेष रूप से लोग आहत होकर यहाँ से जाएंगे.''

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्रोफ़ेसर गंगा में प्रदूषण के खिलाफ जन चेतना जागृत करने का काम करते हैं.

प्रोफ़ेसर दीनानाथ शुक्ल इस बात से चिंतित हैं कि वर्तमान में गंगा और यमुना का हिमालय से आने वाला शुद्ध जल ऊपर ही रोक कर पेय जल या सिंचाई के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है.

शुक्ल कहते हैं, ''इस समय कन्नौज और कानपुर के बाद इलाहाबाद में गंगा का जो जल बह रहा है, वह शुद्ध नालों का जल है, कल कारखानों का जल है या नहरों का जल है. उसमे गंगा (गंगोत्री ) का जल है ही नही. इसलिए सबसे पहले तो उस गंगा के परिप्रेक्ष्य में विचार करने की ज़रुरत है जिसके लिए कुंभ लगता है, जो अमृत की बूँदें हैं. गंगा जीवनदायिनी है, गंगा अमृत धारा कहलाती है. कम से कम वह गंगा तो आगे आए. उसको चाहे टिहरी से छोड़ें, हरिद्वार या नरोरा से छोड़ें.''

कई संत महात्मा और नागरिक हिमालय की गंगोत्री- यमुनोत्री से आने वाला जल संगम तक लाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल करते रहे हैं और अदालत ने आदेश भी दिए. लेकिन अभी तक इस जल के उपयोग का कोई न्यासंगत और तर्कसंगत फार्मूला तय नही हो पाया.

नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन आश्वासन देते हैं कि सरकार कुंभ में आने वाले तीर्थ यात्रियों को शुद्ध गंगा जल उपलब्ध कराएगी.

आलोक कहते हैं, ''गंगाजल बिलकुल मिलेगा. इसके लिए नरोरा से अधिक से अधिक पानी छोड़ने के बारे में माननीय उच्च न्यायालय के भी आदेश हैं और हम लोग भी निर्देश दे रहे हैं. उत्तराखंड से टिहरी बाँध से भी अधिक से अधिक पानी छोड़ने के लिए हम लोग लगातार वहाँ की सरकार के संपर्क में रहते हैं. इसका हम लोग पूरा प्रबंध कर रहे हैं कि पानी उचित मात्रा में रहे और साफ़ रहे जिससे लोग स्नान कर सकें.''

दरअसल गंगा जी ही प्रयाग महाकुंभ मेले के केंद्र में रहती हैं.

पिछले कुंभ मेले के प्रबंधकों में प्रमुख इलाहाबाद के तत्कालीन कमिश्नर सदाकान्त ने अपनी प्रशासनिक रिपोर्ट में लिखा है कि वो कुंभ मेला को एक मानवीय आयोजन नही मानते.

सदाकांत के अनुसार महाकुंभ प्रयाग माँ गंगा द्वारा आयोजित एक दैवीय और आध्यात्मिक महोत्सव है इसीलिए मेले का इंतज़ाम देखने वाले अफसर हमेशा मेला निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए गंगा जी से ही प्रार्थना करते रहते हैं.

Sunday, June 3, 2012

सिंथेटिक डीएनए-पुलिस का काम आसान

ब्रिटेन के छोटे और मध्यम दुकानदारों के लिए खुशी की बात है कि उनके पास अब एक ऐसा हथियार आ गया है जो ना केवल चोरों को डराकर दूर भगा सकता है बल्कि "खतरनाक" चोरों और लूटेरों को पुलिस के हाथों पकडवाने में मददगार भी साबित हो सकता है. ब्रिटेन के दुकानदारों के पास जो नया हथियार आया है वह देखने में मामूली स्प्रे है परंतु है काफी अलग.

यह डिवाइज़
सिंथेटिक डीएनए स्प्रे करता है जो चोरों के शरीर से चिपक जाता है. इस स्प्रे को निकालना काफी मुश्किल होता है और इससे चोरों की पहचान उजागर हो जाती है. यह स्प्रे पराबैंगनी किरणों के सम्पर्क में आते ही चमकने लगता है. जिससे रात के अंधेरें में भी चोरी करने के बाद कहीं छिपे हुए चोरों को ढूंढ निकालना आसान हो जाता है.

सलेक्टाडीएनए नामक इस डिवाइज़ के अंदर एक ऐसा सोल्यूशन भरा हुआ होता है जो शरीर को कोई नुकसान तो नहीं पहुचाता परंतु उससे चिपककर सिंथेटिक
डीएनए की शृंखला बना देता है. इस डिवाइज़ को बनाने वाले एंड्रु नाइट के अनुसार इस चिपके हुए सोल्यूशन को बार बार धोने से भी यह उतरता नहीं है. इसको शरीर से उतारने में काफी समय लगता है.

परंतु यह स्प्रे नथुनों, कान के भीतर और नाखूनों के अंदर भी चला जाता है जहाँ से इसे निकालना और भी कठीन हो जाता है. और इससे
पुलिस का काम आसान हो जाता है. क्योंकि जब ऐसे किसी चोर के शरीर के ऊपर पराबैंगनी किरणें डाली जाती है तो उसके शरीर के वे हिस्से चमकने लगते हैं और इससे साबित हो जाता है कि वही चोर है.

और फिर शायद यह सब करना भी पड़े. क्योंकि यह स्प्रे चोरों को डराकर दूर रखने के लिए काफी है. लंडन के कई दुकानदारों ने अपनी अपनी दुकानों के दरवाजों पर चेतावनी वाला बोर्ड लगा दिया है कि यहाँ सलेक्टाडीएनए का इस्तेमाल होता है, इसलिए बेहतर है दूर ही रहो.

दुकानदारों को उम्मीद है कि मात्र इस चेतावनी का भी चोरों पर बड़ा मानसिक असर पड़ेगा और वे चोरी करने के लिए दुकानों में घूसने से पहले दो बार सोचेंगे

Saturday, June 2, 2012

"आई-पोड फैशन" दुर्घटनाओं को न्यौता

ब्रिटेन में प्रतिदिन होने वाली दुर्घटनाओं में से कम से कम 17 सड़क दुर्घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनके लिए म्यूज़िक प्लेयर को जिम्मेदार माना जा सकता है. यह आँकड़ा काफी बडा है और चिंताजनक भी.

आईपोड धारी वाहन चालक और फूटपाथ पर चल रहे लोगों का ध्यान मार्ग पर चल रही गतिविधियों से हटकर संगीत की तरफ आ जाता है और इससे दुर्घटनाएँ होती हैं. मोटरिंग विशेषज्ञ मानते हैं कि नया "आई-पोड फैशन" दुर्घटनाओं को न्यौता दे रहा है. कानों में लगे इयरफोन इंसान का ध्यान बांट देते हैं. इससे दिमाग की एकाग्रता कम हो जाती है.

डेली मेल की खबर के अनुसार आज अधिक से अधिक वाहन चालक, जोगर, साइकल चालक और फूटपाथ पर चलने वाले लोग मनोरंजन के लिए कार ऑडियो डिवाइज़ या आईपोड अथवा मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं. इससे वे एक वातावरण में पहुँच जाते हैं जहाँ उनकी ड्राइविंग "ऑटोपायलट" की स्थिति में आ जाती है. यही हाल फूटपाथ पर चल रहे लोगों का भी होता है, जब उन्हें पता हीं नहीं चलता कि कब वे अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच भी गए. उनके दिमाग का "ऑटो दिशा निर्देश" सिस्टम उन्हें अपने आप गंतव्य स्थान तक ले आता है और वे संगीत में ही खोए रहते हैं.

परंतु यह ऑटो सिस्टम एकाग्र नहीं होता. इससे हमें अचानक उपस्थिति होने वाले खतरे के बारे में पता नहीं चलता और उससे बचने के लिए जरूरी एकाग्रता भी ना होने से हम आसानी से दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं.

सड़क पार करते समय तेज संगीत सुनते रहने से अचानक तेजी से आ रही कार की तरफ ध्यान केन्द्रीत नहीं हो पाता और दुर्घटना हो जाती है. ऐसा ही कुछ वाहन चालकों के साथ भी होता है.

इससे भी भयावह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब राह पर चल रहे लोग अपने मोबाइल से एसएमएस करने लगते हैं या ईमेल चैक करने लगते हैं. इससे उनका ध्यान और भी अधिक विचलित हो जाता है.

इस तरह से होने वाली दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष 5% की दर से वृद्धि हो रही

स्मार्ट फोन के शिष्टाचार

अब जबकि लगभग हर हाथ में एक मोबाइल फोन जरूर होता है, इसके उपयोग के शिष्टाचार को लेकर भी किताबें और लेख लिखे जा रहे हैं. यहाँ तक कि शिष्टाचार सिखाने वाले इंस्टीट्यूट भी अब मोबाइल शिष्टाचार को अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं.

स्मार्ट फोन आपकी अपनी ऐसी दुनिया होती है जो आपको लगातार अपने मित्रों और बाकी दुनिया से जोड़े रखती है. परंतु हमें यह नही भूलना चाहिए दुनिया सिर्फ उस छोटे से डिवाइज़ तक ही सीमित नहीं है.

एमिली पोस्ट इंस्टीट्यूट की एना पोस्ट के अनुसार - यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने मोबाइल फोन को किस तरह से लेते हैं. उसमें स्विच ऑफ का बटन है और वाइब्रेशन का भी, परंतु उसका उपयोग कब और कैसे करना है यह महत्वपूर्ण है.

वैसे तो मोबाइल फोन  अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग हो सकते हैं, परंतु कुछ आम शिष्टाचार इस प्रकार से हैं.

सार्वजनिक स्थानों, अस्पतालों में मोबाइल वाईब्रेशन पर रखें:
सार्वजनिक स्थानों तथा अस्पताल जैसी जगह पर अपने मोबाइल फोन को साइलेंट या वाईब्रेशन मोड पर ही रखें. सोचिए आप अस्पताल के आईसीयू वार्ड में बैठे हों और आपके मोबाइल पर रिंगटोन के लिए चुनी गई कोई गाने की धुन बजे तो बाकी के लोगों को कैसा लगेगा.

आवाज़ धीमी रखें:
कुछ लोगों को आदत होती है कि वे एसटीडी कॉल को प्राप्त करते ही जोर जोर से बोलने लगते हैं, हालाँकि उसकी आवश्यकता नहीं है. लोकल कॉल के दरम्यान भी अपनी आवाज को धीमी ही रखें. विशेष रूप से यदि आप सार्वजनिक स्थानों पर हों तो अपनी आवाज उतनी ही रखें जितनी मात्र आपके कानों तक जाए. यदि आपको लगे की सामने वाले व्यक्ति को आवाज सुनाई नहीं दे रही तो फोन के आसपास अपने हाथों से घेरा बना लें.

किसी से बात करते समय मोबाइल का इस्तेमाल ना करें:
जब आप किसी अन्य व्यक्ति के साथ बातचीत या चर्चा कर रहें हों तो अपने मोबाइल का इस्तेमाल टाल दें. फोन को स्विच ऑफ कर दें या फिर साइलेंट. यदि कोई बहुत ही महत्वपूर्ण कॉल आ जाए तो कॉल उठाने के लिए थोड़ी दूर चले जाएँ और इसके लिए सामने बैठे व्यक्ति से क्षमा मांगे. कॉल को जल्द से जल्द खत्म कर वापस आएँ. कम महत्वपूर्ण कॉल को अनदेखा कर सकते हैं या फिर पहले से तैयार एसएमएस टेम्पलेट का उपयोग कर ऐसे कॉल करने वाले लोगों को संदेश भेज सकते है कि आप व्यस्त हैं, बाद में कॉल करेंगे.

धार्मिक स्थानों पर मोबाइल बंद कर दें:
धार्मिक स्थानॉं जैसे कि मंदिर में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो आपकी मनपसंद रिंगटोन को सुनने में रूचि रखता होगा. इसलिए बेहतर होगा आप मोबाइल फोन को साइलेंट रखें. वाईब्रेशन मोड से भी किसी को परेशानी हो सकती है.

अन्य लोगों के बीच अपनी रिंगटोन ना बजाएँ:
यदि आप अपने मित्रों के इतर कुछ नए लोगों से मिल रहे हैं तो अपने मोबाइल की रिंगटोन को बदल कर कोई सामान्य धुन रख लें. यकीन मानिए लोगों किसी दूसरे के मोबाइल पर बजी गानों पर आधारित रिंगटोन सुनना अच्छा नहीं लगता.

विद्यालयों में मोबाइल फोन बंद रखें:
यदि आप विद्यार्थी हैं तो अपने स्कूल-कॉलेज में क्लास के सत्र के दौरान मोबाइल स्विच ऑफ कर दें. अधिकतर स्कूलों और कॉलेजों में पहले से यह नियम लागू है, यदि आपके कॉलेज में यह नियम ना भी लागू हो तो भी आप इसे अमल में ला सकते हैं. मोबाइल स्विच ऑफ होगा तो आपके मन में कोई गेम खेलने का विचार भी नहीं आएगा और आप पढाई में ध्यान लगा पाएंगे

Thursday, May 24, 2012


ना
जाने कौन सी बात आखरी हो जाए
ना जाने कौन सी रात आखरी हो जाए
हाल चाल पूछते रहा करो दोस्त
ना जाने कौन सी सांस आखरी हो जाए


जब जब मेरे ख्यालों मैं,
तेरा चेहरा ऊबर आयेगा
,
नीद हमको आयेगी
,
चैन तुमको बी आयेगा
,
यह हश्र तो होगा हमारा
,
हर रात हमारी जिन्दगी में
,
करार हमको आये तो
,
करार तुमको बी आयेगा
,


नैनो मे बसे है ज़रा याद रखना
,
अगर काम पड़े तो याद करना
,
मुझे तो आदत है आपको याद करने की
,
अगर हिचकी आए तो माफ़ करना
.......

ये दुनिया वाले भी बड़े अजीब होते है

कभी दूर तो कभी क़रीब होते है
दर्द ना बताओ तो हमे कायर कहते है
और दर्द बताओ तो हमे शायर कहते है .......


एक मुलाक़ात करो हमसे इनायत समझकर
,
हर चीज़ का हिसाब देंगे क़यामत समझकर
,
मेरी दोस्ती पे कभी शक ना करना
,
हम दोस्ती भी करते है इबादत समझकर
.........


ख़ामोशियों की वो धीमी सी आवाज़ है
,
तन्हाइयों मे वो एक गहरा राज़ है
,
मिलते नही है सबको ऐसे दोस्त
,

मैली ही रहेगी यमुना

यमुनानगर में पश्चिमी यमुना नहर की दुर्गति देखकर हरियाणा विधानसभा की पब्लिक एकाउंट्स कमेटी यानी पीएसी के सदस्यों की त्वरित टिप्पणी यह बताने के लिए काफी है कि नदियों की सफाई के नाम पर अब तक दिखावे के आंसू बहाए जा रहे थे। योजनाएं बनी, केंद्र से धन भी आया पर कहां गया, कोई बताने को तैयार नहीं, हां फाइलों का पेट जरूर भर दिया गया। यमुना में गंदगी बहे, जहरीले रसायनों की लहरें उठें या फिर योजनाओं के अवशेष जल बहाव का रास्ता रोकें, लगता है अभी किसी को कोई चिंता नहीं। कितना कड़वा सत्य है कि पश्चिमी यमुना नहर को अधिकारी डंपिंग स्टेशन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में सोनीपत से पानीपत तक यमुना की सफाई के लिए करोड़ों की योजना बनी थी। केंद्र तथा राज्य स्तर पर इस नदी की सफाई के लिए पिछले पांच वर्षो के दौरान कम से कम छह बार विमर्श हुआ, प्रदूषण पर दिल्ली सरकार से दो बार झड़प हुई, केंद्रीय जल बोर्ड ने निर्देश जारी किए पर इन सब का नतीजा क्या निकला? न प्रदूषण में मामूली कमी आई, न किसी योजना को अंतिम रूप दिया जा सका और न ही निकट भविष्य में किसी योजना पर प्रभावशाली क्रियान्वयन की संभावना नजर आ रही है। पीएसी के सदस्यों ने ट्विन सिटी यमुनानगर और जगाधरी में जो कुछ देखा और प्रतिक्रिया व्यक्त की उसके आलोक में राज्य सरकार को तत्काल जागते हुए एक्शन प्लान तैयार करके कम से कम अपने हिस्से की यमुना को साफ करने पर गंभीरता से जुट जाना चाहिए। रसायनयुक्त कचरा और सीवर का पानी सीधे नहर में गिराया जाना पानी को खतरनाक तो बना ही रहा है और साथ ही यमुना की पवित्रता पर भी कुठाराघात कर रहा है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा हो सकता है। विधानसभा की महत्वपूर्ण कमेटी अपनी रिपोर्ट प्रदेश सरकार को जल्द से जल्द सौंपे। इसके तथ्यों, निष्कर्षो के आधार पर वृहद योजना बनाई जाए और उस पर पूरी ईमानदारी से काम भी हो। सरकार इसमें रूचि भी ले क्योंकि उसकी अनदेखी के कारण ही यमुना खनन माफिया की पहली पसंद बन गई। भविष्य निश्चिंत रहे, इसके लिए जरूरी है वर्तमान में सतर्क और सक्रिय रहना। यमुना किनारे स्थित उद्योग इकाइयों पर विशेष निगरानी रखी जानी चाहिए। कड़े आर्थिक दंड और तालाबंदी जैसे प्रावधान यमुना को और मैली होने से बचा सकते हैं।

नापाक मंसूबे

उत्तरी कश्मीर के सोपोर कस्बे में पिछले तीन दिन में सुरक्षाबलों पर हमलों की घटनाएं इस दृष्टि से चिंताजनक हैं कि इन वारदातों को अंजाम देने वाले छात्र हैं जिन्हें आतंकी अपने नापाक मंसूबों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। विगत दिवस सोपोर में सुरक्षाबलों ने एक संदिग्ध किशोर को रुकने के लिए कहा तो वह भागने लगा। जब उसका पीछा किया तो उसने पिस्तौल निकालकर जवानों पर एक के बाद एक चार गोलियां दाग दीं। भीड़ का फायदा लेते हुए वह भागने में सफल हो गया। पिछले तीन दिन में जो भी हुआ उस सबके पीछे अलगाववादियों का हाथ है जो घाटी में शांति के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं। चूंकि अमरनाथ यात्रा जून में शुरू होने जा रही है और कुछ शरारती तत्वों की यह कोशिश है कि किसी तरह घाटी में माहौल को बिगाड़कर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाएं। बात अगर वर्ष 2010 की करें तो घाटी में एक साजिश के तहत माहौल को बिगाड़ा गया था और तब पत्थरबाज जिसमें अधिकतर किशोर शामिल थे सुरक्षाबलों के लिए सिरदर्द बन गए थे। सोपोर कस्बे में सुरक्षाबलों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इन वारदातें में जो भी दोषी हैं और इन के पीछे किन लोगों का हाथ है उनकी पहचान करना जरूरी है। घाटी में कई दीवारों पर भारत विरोधी नारों को हल्के से नहीं लिया जाना चाहिए। यह सब कुछ एक साजिश के तहत हो रहा है। इनके पीछे कौन लोग हैं उन्हें ढूंढ निकालना बहुत जरूरी है क्योंकि अमरनाथ यात्रा से पहले इस तरह की हरकतें लोगों की भावनाओं को भड़काने का काम करेंगी जिससे हालात बेकाबू हो सकते हैं। अलगाववादियों की कोशिश है कि किसी तरह सुरक्षाबलों को उकसाया जाए और इस मामले को एक बड़ा तूल दिया जाए। अगर हालात बिगड़ते हैं तो पर्यटकों की संख्या पर निसंदेह इसका विपरीत असर पड़ेगा। अब अमरनाथ यात्रा भी शुरू होने जा रही है और देश-विदेश से सैलानी वादी की सैर के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह स्थिति पर नजर रखे। अभिभावकों को भी चाहिए कि वह अपने किशोरों पर पूरी नजर रखें क्योंकि यह एक ऐसी उम्र होती है जब वह बातों में आकर ऐसी वारदातों को अंजाम दे देते हैं जिसके लिए उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को पछताना पड़ता है।

Sunday, May 13, 2012

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रविवार को संसद की पहली बैठक के साठ वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए सभी सांसदों और देशवासियों को बधाई दी। उन्होंने इस दौरान आए उतार-चढ़ाव की चर्चा करते हुए कहा कि हमें भविष्य में नया अध्याय लिखना है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र पर विश्वास और आस्था की वजह से ही विश्व में हमारा कद ऊंचा हुआ है। मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में अपने संबोधन के दौरान कहा कि उन्हें अपने 21 वर्षो से राज्यसभा का सदस्य होने पर गर्व है।
इस अवसर पर सोनिया गांधी ने कहा कि आज का लोकतंत्र आम आदमी का लोकतंत्र है। उन्होंने कहा कि इन साठ सालों में आम आदमी के देखे सपने सच हुए और यह संसद उसकी गवाह बनी है। उन्होंने कहा कि जनता की सबसे बड़ी ताकत यही संसद है जिसने ऐसे कानून बनाए जिनकी बदौलत आम आदमी को फायदा हुआ देश का विकास संभव हुआ।
प्रणब मुखर्जी ने संसद की आगामी चुनौतियों के बारे में बात की। इन साठ वर्षो में उन्होंने बहुत कुछ बदलते देखा। उन्होंने कहा कि अभी भारत को बहुत आगे जाना है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संसदीय लोकतंत्र की सराहना करते हुए कहा कि इसी राह पर चलते हुए भारत जल्द ही विश्व शक्ति बनेगा। उन्होंने कहा कि भारत ने साठ वर्षो तक सफल लोकतंत्र बनाए रखा है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं।
राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा कि इन 60 सालों में विपरित हालातों में भी देश में लोकतंत्र की स्थिति मजबूत हुई। मायावती ने बाबा भीमराव अंबेडकर को याद करते हुए संसद की कामयाबी का श्रेय उन्हें दिया।
रविवार को शाम चार बजे राष्ट्रपति संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करेंगी। इस मौके पर पहली लोकसभा के सदस्य रिशांग कीशिंग, रेशम लाल जांगिड़ और केएस तिलक को सम्मानित किया जाएगा। मणिपुर के कीशिंग वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं।
ज्ञात हो कि लोकसभा और राज्यसभा के पहले सत्र की शुरुआत 13 मई 1952 को हुई थी और इसी मौके को यादगार बनाने के लिए इस विशेष सत्र का आयोजन किया गया है।
शाम 4.00 बजे से संसद के सेंट्रल हाल में समारोह का आयोजन होगा। राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और मीरा कुमार दोनों सदनों के सदस्यों को संबोधित करेंगे। शाम को दोनों सदनों के संयुक्त सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगा।
इस मौके पर राष्ट्रपति 5 और 10 रुपये के सिक्के और 10 रुपये के विशेष डाक टिकट जारी करेंगी। साथ ही संसदीय लोकतंत्र को यादगार बनाने के लिए राष्ट्रपति कुल आठ पुस्तकों का विमोचन करेंगी। शाम को विख्यात संतूर वादक शिवकुमार शर्मा, देबू चौधरी, कर्नाटक संगीत के कलाकार महाराजा रामचंद्रन, शुभा मुद्गल और इकबाल खान अपनी प्रस्तुति पेश करेंगे। कई देशों के राजदूत भी जश्न के गवाह बनेंगे।

Thursday, March 29, 2012

frad police

Ghazipur: A local court has directed registration of a case against five senior Uttar Pradesh police officials, including SDG Brij Lal, on a complaint accusing them of irregular deduction from constables' salaries.


The court has ordered lodging the case against the five officers, including Special Director General of Police (Law and Order) Brij Lal and SP Ghazipur.

Judicial Magistrate Nishant Deo passed the order yesterday on an application moved by constable Brijendra Yadav.


In his complaint, Yadav alleged that irregular deductions were made from the salaries of constables and when he raised the issue, the officials from the department "started harassing him".