इस पर एक नज़रिया यह है कि यूपीए की नीतियों और निर्णयों पर नज़र रखने वाला वाममोर्चा इस बार नहीं है और दूसरा नज़रिया यह है कि यूपीए सरकार के हर काम में अडंगा लगाने वाले वामपंथियों को वर्ष 2009 के आम चुनाव ने हाशिए पर डाल दिया.
इसमें से जिस भी नज़रिए से सहमत हुआ जाए, इसका निहितार्थ एक ही है कि 2009 की राजनीति ने 32 साल से पश्चिम बंगाल में शासन कर रहे वाममोर्चा के क़िले में दरार डाल दी है.
चुनाव से पहले लोकसभा में वाममोर्चा के 57 सांसद हुआ करते थे और नई लोकसभा में उनकी संख्या घटकर 22 रह गई है. और ऐसा नहीं है कि उनकी ताक़त सिर्फ़ लोकसभा में कम हुई है, पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी जो कुछ हो रहा है, उसने भी संकेत दिए हैं कि वर्ष 2011 में होने वाले विधानसभा के चुनाव उनके लिए कठिन साबित होने वाले हैं.
2004 के लोकसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से 35 सीटें वाममोर्चा के पास थीं, लेकिन 2009 के चुनाव में वे सिर्फ़ 15 सीटें जीत सके.
इसके बाद राज्य में 16 नगर निकायों के चुनाव हुए जिसमें से 13 पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की. इससे पहले वाममोर्चा इनमें से 11 पर शासन कर रहा था. पंचायत चुनावों में भी वाममोर्चा को करारी हार का सामना करना पड़ा है.
10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए तो आठ सीटों पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की. वाममोर्चे का नेतृत्व करने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) को एक भी सीट नहीं मिली. वाममोर्चे की ओर से एकमात्र जीत मिली फ़ॉरवर्ड ब्लॉक को.
वैसे राज्य की राजनीति में साल प्रारंभ होते ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी जब नंदीग्राम में वाममोर्चा के एक अहम भागीदार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को तृणमूल कांग्रेस ने शिकस्त दी.
भूमि-सुधार की हिमायती रहे वाममोर्चा ने जब सिंगुर और नंदीग्राम में भूमि-सुधार के एकदम दूसरे सिरे पर जाकर उद्योगों के लिए ज़मीन देने का फ़ैसला किया तो उनके अपने काडर को यह नागवार गुज़रा. बहुत से लोगों को लगता था कि ममता बैनर्जी ने टाटा के नैनो परियोजना को राज्य से बाहर भेजकर राज्य का बहुत नुक़सान किया है लेकिन चुनाव परिणामों ने ज़ाहिर कर दिया कि इस बुद्धिजीवी सोच से मतदाताओं की सोच एकदम अलग है.
दूसरी ओर सिंगूर और नंदीग्राम में सुनियोजित हिंसा के जो आरोप लगे उसे धोना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.
वैसे पश्चिम बंगाल में एक नया परिवर्तन यह दिखा कि कलाकार और रचनाकार कभी संस्कृति पुरुष कहे जाने वाले बुद्धदेव के ख़िलाफ़ खड़े हो गए और फ़िल्म समारोह तक का बहिष्कार हुआ.
चुनाव परिणामों ने स्वाभाविक रुप से वाममोर्चा के घटक दलों के बीच भी मतभेद पैदा कर दिए हैं और अब सहयोगी दल ही सीपीएम काडर और उसके नेताओं की कार्यप्रणाली पर उंगलियाँ उठाने लगे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मानिनी चटर्जी कहती हैं, “पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो कुछ भी दिख रहा है कि वह ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी की जीत से अधिक वाममोर्चे की हार है.”
वे मानती हैं कि वर्ष 2009 के घटनाक्रम ने पार्टी के नेताओं के भीतर हताशा पैदा कर दी है. वे कहती हैं, “पश्चिम बंगाल में वामपंथी नेता जिस तरह से बर्ताव कर रहे हैं, उससे लगता है कि नेता पहले ही हार मान चुके हैं. उनका विश्वास बिखर गया है.”
हालांकि वे मानती हैं कि चुनाव की राजनीति में डेढ़ साल बहुत होते हैं और हो सकता है कि वाममोर्चा 2011 के विधानसभा के पहले अपना घर संभाल ले.
लेकिन ऐसा होने की संभावना कम ही दिखती है.
क्योंकि जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ़ पश्चिम बंगाल में ही नहीं हो रहा है. केरल, जहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन और सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन बारी-बारी से सत्ता में आता रहा है, स्थिति बहुत अलग नहीं दिख रही है.
वहाँ मुख्यमंत्री अच्युतानंदन और सीपीएम के राज्य इकाई के सचिव पिनरई विजयन के बीच जो विवाद हुआ उसने भी पार्टी की अंदरुनी स्थिति को बयान किया.
निश्चित तौर पर वामपंथी दलों के भीतर असमंजस की स्थिति है. और जैसा कि मानिनी चटर्जी कहती हैं कि यह दुविधा भाजपा की दुविधा से बड़ी है
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